Monday, 3 June 2013

दिलेर

दिलेर

इस शहर में आकर मैं बहुत अकेली हो गई थी। कोई मित्र नहीं, मित्रता करने लायक अडोस-पड़ोस नहीं। यह अफरा-तफरी वाला शहर था, जहां चौबीसों घंटे एक भागदौड़ सी मची रहती थी। न जाने, सब कहाँ भाग रहे हैं और क्यों? आराम से चल कर जाएं, जहां भी जाना हो। लेकिन आराम से चलने जितना समय किसके पास था? ज़िन्दगी की दौड़ में पिछड़ जाने के भय से जैसे सभी आतंकित हों।

एक चढ़ती सी उम्र होती है जहां दोस्तियाँ यूं होती हैं चुटकी बजाते। मेरे लिए उस चढ़ती सी उम्र में ही एक अदद मन की सी सहेली ढूंढ पाना सहज नहीं था तो अब तो बात ही दूसरी थी। कसूर मेरा ही था। मुझमें वह बात नहीं कि मैं आसानी से कोई मित्र बना सकूं। कोई मुझमें ही कोई खासियत खोज ले और मेरा मित्र बन जाए तो बात अलग है। अन्यथा किसी को मित्रता की हद तक अपने में रमाए रखने लायक चुस्ती, फुर्ती, और सलीका मुझमें नहीं है। मुझसे दोस्तियाँ नहीं होती, फिर भी एक अच्छे दोस्त की लालसा मेरे मन के बंजर में लहलहाती रही है। इस भागते हुए शहर में अच्छा दोस्त क्या, सिर्फ दोस्त की कामना भी आकाश के तारे के सामान थी, जिसे तोडना क्या, तोड़ने की सोचना तक मुझ जैसी मंदगति के लिए एक अजूबा था।

वैसे  इस शहर के नामी-गिरामी होने में संदेह नहीं किया जा सकता था। एक बार एक सरकारी सभा में मिले एक विदेशी से मैंने औपचारिकतावश पूछ लिया था कि उसे यह शहर कैसा लगा। उसने आँखों में चमक भर कर उल्लसित स्वर में कहा था, 'ब्यूटीफुल, योर बॉम्बे इज लाइक न्यूयॉर्क ऑफ इण्डिया।' इसी न्यूयॉर्क ऑफ इण्डिया में मैं अकेली रहा करती थी और उदास। पूरा शहर व्यस्त था और मैं खाली। जिसे सुनो उसे फुर्सत नहीं और मुझे फुर्सत ही फुर्सत।

उन्हीं फुर्सत के दिनों में मैंने अचानक उसे एक मैगजीन स्टॉल पर देखा था। दुनिया सचमुच छोटी है। बिछड़े हुए लोग मिल ही जाते हैं। कहीं न कहीं, कभी न कभी। इस अहसास के साथ मुझे लगा था कि मैं व्यस्त हो उठी हूँ और बम्बई उतना बुरा नहीं है जितना मैंने सोचा था।

उसके लिए भी, जैसा कि उसने बताया, यह एक सुखदायी आश्चर्य था कि मैं बम्बई में आ गई थी। वह लगभग दस वर्ष पूर्व आया था, फिल्मों में जमने के इरादे से। फिल्मों में जमा या नहीं, इसकी कोई जानकारी मुझे नहीं थी लेकिन बम्बई में उसके पाँव ज़रूर जमे हुए नज़र आ रहे थे, इसका अनुमान मैंने उसकी कार से लगाया था। वह पिता की इच्छा के विरुद्ध बम्बई आया था इसलिए पिता के दिए हुए ठाठ-बाठ आने से पूर्व ठुकरा चुका था।

वक्त काटने की समस्या उस समय मेरे सम्मुख एकमात्र समस्या थी। उससे मुलाकात का यह संयोग मुझमें एक चमत्कारिक आह्लाद भर गया था। कैसे-कैसे मौत के से दिन गुज़रे हैं अकेलेपन में। मैं उस पहली यानि उससे बम्बई की पहली मुलाकात में सब कुछ तय कर लेना चाहती थी। कहीं आज का मिला वह दोबारा मिले, न मिले। हालाँकि मैं इस सत्य से परिचित थी कि तय करने से कुछ तय नहीं होता, जो होता है, अपने आप होता है, फिर भी मन को समझाने के  मन कैसे-कैसे स्वांग  है, इसे मुझसे बेहतर कौन जान सकता था?

बम्बई में जमे होने के अपने तामझाम दिखने के लिए वह मुझे ले जा रहा था तो मैंने बहुत बेसब्र होकर कहा था, 'देखो, अब हम अच्छी दोस्ती करेंगे।'

उसने पुराने अंदाज़ में ठहाका लगाया था और बोला था, 'दोस्ती और तुम? तुम दोस्ती कहाँ करने देतो हो?'

वह 'दोस्ती' और 'प्यार' को यूं ही गडमड किया करता था। उस के बस का था भी नहीं दोस्ती करना। दोस्ती की महत्ता मुझ जैसा नाकाबिल व्यक्ति ही समझ सकता था जिसे लोगों को अपने में रमाने की कला न आते हुए भी एक अच्छे दोस्त की तमन्ना और तलाश हमेशा रहती थी। यूं उसमें तलाश पूरी हो जाने की मुझे कोई उम्मीद नहीं थी।

'मज़ाक छोडो। तुम्हारे शहर में मैं कितनी अकेली हूँ ....'

मेरा शहर?'

'हाँ, अब तुम इस शहर के हो गए हो। आज किस्मत से मिल गए हो तो देखो, मुझे अकेले बोर मत होने देना।' अपने अकेलेपन से मैं इतनी त्रस्त  थी कि उसके सामने घिघियाने में भी मुझे लाज न आई। फिर उसके आगे मैं कुछ तो खुल ही सकती थी। साथ जिया एक बेमतलब सा वक्त भी कैसा अपनापन जगा देता है। इसी 'जागी हुई' अवस्था में मैंने उसे पुराने संबोधन से पुकार कर कहा था, 'दिलेर, अपनी दोस्ती पक्की ना?'

'हाँ दब्बू, पक्की, एकदम पक्की।'

न 'दिलेर' उसका नाम था, न 'दब्बू' मेरा। इन नामों का चुनाव उसी का था जो हमारी ज़ुबानों पर निकला था। जो बेधड़क होकर प्रेम निवेदन कर सके, वह दिलेर और जो प्रेम को स्वीकार करने में अपने दिल और दुनिया और दुनिया जहान से डरता रहे, वह दब्बू .... उसकी दी हुई परिभाषा थी जिसका जन्म हमारी नासमझ उम्र के शरारती दिनों में हुआ था।

हमारे परिचय की शुरुआत असाधारण तरीके से हुई थी। हम दोनों कहानी के पात्रों की तरह अचानक नहीं मिले थे। उसने मुझे खोजा था, मैंने उसे।

उसे अभिनय के साथ-साथ गाना गाने का भी शौक था। जैसे वह नाटकों में अपने अभिनय से नए-नए प्रयोग किया करता था, वैसे ही गाने में भी। लेकिन उस समय वह इस सब में इतना नया था कि मैं उसके नाम से अपरिचित थी।

एक सुबह समाचार पत्र में एक छोटी सी खबर की ओर मेरा ध्यान अचानक चला गया और मैं अपना नाम पढ़ कर चौंक गई। 'प्रियंका प्रसाद की कविताओं की गीतमय प्रस्तुति।' मेरी कवितायेँ गीतों के रूप में किसी ने गाईं, कौन है वह? मैं तो गाई जा सकने योग्य कवितायेँ ही नहीं लिखती। अतुकांत गद्यसम लगने वाली कविताओं को कोई क्या खाकर गाएगा?

'यही तो मेरा प्रयोग था,' उसने मिलने पर बताया था। वह मुझे ढूंढ रहा था, और मैं उसे। जब दोनों के नाम अख़बारों में छप चुके थे तो ढूंढ निकलना कौन सा कठिन था।

'आपकी कविताओं में तुक भले ही न सही, अर्थ की लय गज़ब की है,' उसने कहा था।

थोड़ी और जान-पहचान बढ़ने पर जब एक दिन वह 'आप' से 'तुम' पर उतर कर बोला था, 'तुम्हारा नाम बड़ा आकर्षक है। पी पी से प्रेम प्यार, पी पी से पहेली परेशानी,' तो मैं समझ गई थी कि उसे निश्चय ही मेरी कविताओं से अधिक मेरे नाम के सौंदर्य ने खींचा था। यह बात मैं कई मुखों से सुन चुकी थी कि मेरा नाम बहुत सुन्दर है, अनुप्रास का कर्णसुख देता हुआ। इसी अच्छे-भले नाम का उसने सत्यानाश किया था मुझे 'दब्बू' नाम देकर।

वे बड़े फ़ालतू से दिन थे। दिन भर सड़कें नापते रहो, रातों को घर देर से पहुँचो और सुबह होते ही एक-दूसरे का फोन खड़खड़ा दो। घंटों फोन पर रात देखे सपनों का हिसाब देते रहो, शामों को बागों में बहारों में एक-दूसरे का हाथ हाथों में लिए कविताओं को गाते टहलते रहो। ऐसे में वह कभी कुछ कहने को होता तो मैं उसके होठों पर अपनी ठंडी हथेली रख देती, 'नहीं, कोई शब्द मत दो।'

मेरे मना करने के बावजूद वह मेरे कानों में गुनगुना उठता, 'प्यार को प्यार ही रहने दें, कोई नाम न दें?'

एक दिन वह नामालूम किस झोंक में कह उठा था, 'मैं तुमसे प्यार करता हूँ दब्बू, कुछ तुम भी तो कहो।'

अगर किसी के कंधे पर हाथ रख कर सड़क पार करना या किसी के बालों को सहला लेना ही प्यार हो तो वह मुझसे ज़रूर प्यार करता था। लेकिन न जाने क्यों, मुझे प्यार का अहसास यूं नहीं होता था। मैं जानती भी नहीं थी कि आखिर मुझे प्यार का अहसास होगा भी कैसे? वह जो भी था, कम से कम उतना दिलेर नहीं था कि मुझे प्यार का अ आ इ ई सिख सके। मैं दब्बू थी पर उतनी नहीं कि सीखने से इन्कार कर देती। कुछ ज़रूर था जो हम दोनों के बीच से गायब था। 

एक दिन उसने मुंहफट होकर कहा था, 'चलो, शादी कर लें, अभी, इसी वक्त।'

'पागल हुए हो क्या?'

'शादी करने में पागल होने की भला क्या बात है?'

मैंने उसे छेड़ा था, 'कहाँ मैं, इतनी बड़ी कवियित्री, कहाँ तू, बेरोजगार छोकरा ....?'

मेरी इस बात पर उसने अदाकार की मुद्रा ग्रहण की थी और अभिनय कला से अपने शब्दों को चमकाते हुए बोला था, 'बालिके ! रोएगी तू एक दिन जब हमारे आगे-पीछे टॉप की हीरोइनें घूमेंगी। यह भविष्यवाणी सुन कन्या, बहुत जल्द तेरी कविताओं को गाने वाला यह पी पी यानि प्रियंका प्रसाद का पागल प्रेमी सिनेमा के सितारों की नामाकूल नगरी में अपनी धाक जमाने के लिए प्रस्थान करने वाला है। बुद्धिहीन लड़की, आगे बढ़ कर हाथ थाम ले। ऐसा सुनहरी मौका तेरी ज़िन्दगी में दोबारा नहीं आने वाला।'

मैं तुरन्त उसका हाथ थाम कर अभिनय की दुनिया से बाहर निकालते हुए यथार्थ के धरातल पर ले आई थी और हम देर तक एक-दूसरे में उलझे हुए ठहाके लगाते रहे थे। प्रेम-प्यार की धीरता-गंभीरता हम दोनों के बीच थी ही कहाँ।

बीते हुए दिनों का चाहे कोई अर्थ नहीं था, पर खुशबु अच्छी थी। इसी खुशबु में नहाए हुए हम दोनों ने उसके आलिशान ऑफिस में कदम रखा था।

यूं ऑफिस जैसा ऑफिस वह नहीं था। मेज़-कुर्सियां थीं लेकिन टाइप राइटर और फाइलें कहीं नज़र नहीं आ रहे थे। लोग थे लेकिन उनके हाथों में कलम-कागज़ नहीं थे। चारों तरफ दीवारों पर विभिन्न फिल्मों की तस्वीरें चिपकी हुई थीं। बिखरे हुए  होने के कारण लोग जितने थे, उससे ज्यादा नज़र आ रहे थे। एक मुख्य चीफ-के-नुमा कुर्सी खाली थी। वह जाकर उस कुर्सी पर बैठ गया तो भीड़ उसमे इर्द-गिर्द इकट्ठी हो गई। उसने मुझे अपने पास एक कुर्सी पर आदर से बैठाया। मैं उसके करिश्मे को बेवक़ूफ़ की तरह देखने लगी।

कोई लड़का उसके पास अपनी स्क्रिप्ट लेकर आया था तो कोई लड़की अपनी फोटो। कोई अपनी आवाज़ का कैसेट उसकी ओर बढ़ा रहा था तो कोई अपनी एलबम। कोई अपने ऊँगली पकडे बच्चे को उससे मिलवा रहा था तो कोई अपना खुद का परिचय दे रहा था। मैं प्रभावित हुई, इस बात से भी कि वह शांत भाव से सबको उम्मीदें देने वाली जुबान में सफलतापूर्वक टरका रहा था।

धीरे-धीरे भीड़ छंट गई। कुछ नौकर-चाकर रह गए और एक तीखी नाक वाली लड़की ढीठ सी हमारे सामने वाली कुर्सी पर बैठी रही।

'यह हमारी ड्रेस डिज़ाईनर जूली है,' उसने परिचय कराते हुए कहा, 'जूली, आज मैं बहुत बिजी हूँ। यह परदेस से मेरी बहुत पुरानी दोस्त आईं हैं।'

'कोई बात नहीं, मैं वेट कर लूंगी,' उस ढीठ लड़की ने मुझे घूरते हुए कहा और दूर अलग पड़ी एक कुर्सी पर जाकर बैठ गई।

वह मुझे अपना ऑफिस दिखने लगा। पार्टीशन के उस ओर फिल्मों की रीलों के ढेर, हैंगरों में लटके हुए भिन्न-भिन्न प्रकार के कपडे, गैस का चूल्हा, कुछ बर्तन, फ्रिज, और बहुत सा अटरम-पटरम। एक बंद कमरा और था जिसके बाहर कुछ जोड़ी जूते पड़े थे। दरवाज़े पर लिखा था, 'नो एडमीशन, विदाउट परमीशन।' हम भी जूते सैंडिल उतर कर दरवाज़ा ठेल कर भीतर चले गए। वह तो मालिक था, उसे किससे परमीशन लेनी थी? भीतर कई प्रकार की मशीनों के अम्बार थे। कई टी वी सेट, विडिओ रिकॉर्डर, वीडिओ प्लेअर पर लोग व्यस्त थे। विभिन्न प्रकार की धुनों का मिलाजुला शोर था, जिसकी आवाज़ हमें बाहर सुनाई नहीं दी थी। एक कोने में कार्निस पर देवी-देवताओं के कुछ चित्र रखे थे जिन पर ताज़े फूलों की मालाएँ टंगी थीं और धुप एवं अगरबत्ती से कमरा सुवासित था। एक मसनद थी जिस पर गाव तकिये लगे थे। 'इसकी यहाँ क्या ज़रुरत?' मेरे मन में जिज्ञासा जागी। 'अरे, तो क्या कुर्सियों पर अकड़ कर वीडियो देखेंगे? उबरो, इस मानसिकता से उबरो। हर चीज़ में गन्दगी देखना पिछड़ेपन की निशानी है।' मुझे अचानक जूली का ख्याल आया और उसकी आँखों की वह कडवी फडफड़ाहट याद आई, जिससे उसने मुझे घूर कर देखा था। शायद जूली और दिलेर के बीच कुछ चल रहा हो और दिलेर मुझसे लिहाजा-लिहाजी ....? मैंने दिलेर से यह पूछना उचित समझा तो उसे मज़ाक में बात उड़ा कर कहा, 'इस दुनिया में हरेक के बीच कुछ न कुछ चल रहा है सिवाय मेरे और तुम्हारे।'

इस बीच उसने एक लड़के को बाहर होटल से खाना लाने भेज दिया था। खाना आया तो मुझे फिर जूली का ख्याल आया। 'वह बेचारी बाहर तुम्हारे इंतज़ार में बैठी है, उसे भी बुला लो।'

'मेरे इंतज़ार में तो न जाने कितनी लडकियां बैठी हैं। सबकी ओर ध्यान दूं तो मैं तो गया काम से।' दिलेर जैसे खूंखार नाम से मुझे जैसे अरुचि सी हुई। कैसा तो दिल-दिमाग में सनसनाहट और रोशनी पैदा करता नाम है उसका, संदीप।

मैं और संदीप जब खाना खाकर बाहर निकले तो जूली उसी विद्रोही पोज़ में जमी हुई थी। 'आओ जूली, तुम्हें छोड़ दूं,' कहते हुए उसने जूली को कुर्सी से उठाते हुए उसका हाथ पकड़ा तो जूली ने झटक दिया और तेज़ चाल से बाहर निकल कर उसकी कार के पास जा खड़ी हुई। हम दोनों कार के पास पहुंचे तो संदीप ने अगला दरवाज़ा खोल कर मुझे और पिछला दरवाज़ा खोल कर उसे बैठने के लिए कहा। यह जूली के साथ सरासर ज्यादती थी। यह ज़ाहिर था कि संदीप मुझे मान देने के लिए यह नहीं कर रहा था बल्कि जूली को काटने के लिए कर रहा था। हुआ भी यही। उसने जूली को अगले मोड़ पर उतार दिया लेकिन उतारने से पूर्व कार का दरवाज़ा खोलने और उसका कन्धा थपथपाने का शिष्टाचार बरतना वह नहीं भूला।

जूली के विदा होने पर उसने गाड़ी स्टार्ट की। जूली के लिए मेरे मन में अभी भी सम्वेदना थी। 'बेचारी ....' मेरे मुंह से सहसा निकला।

'वह बेचारी-वेचारी कुछ नहीं है, बहुत चालू है। हर लड़की तुम्हारी तरह दब्बू नहीं होती। तुम तो दिखाती हो कि तुम तेज़ हो पर हो एकदम बुद्धू। इतने दिन बम्बई में आए हो गए और टसुए बहाती घूम रही हो कि हाय, मैं अकेली हूँ। कोई मुझसे बोल ले।'

जब वह मुझे मेरे अभिभावक की तरह डांट चुका तो एक पल रुक कर नरमी से बोला, 'तुम्हें यह क्यों न याद आया कि मैं भी यहीं हूँ, इसी शहर में ....'

'मुझे याद था लेकिन तुम्हारा पता ठिकाना ....?'

'टेलीफोन डायरेक्टरी में देखने की कोशिश की कभी?'

उससे विदा लेने के बाद मुझे देर तक लगता रहा कि मैं तो वाकई बुद्धू हूँ। कम से कम वक्त काटने के लिए ही कभी टेलीफोन डायरेक्टरी के पन्ने पलट लेती। उसका नाम इन दिनों में मुझे भूला तो नहीं था।

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फोन पर मुझे उसकी आवाज़ सुनने की ही अपेक्षा थी लेकिन उधर से एक लड़की की कोमल आवाज़ में 'हेलो' सुनाई दिया तो एकबारगी मुझे यही लगा कि शायद गलत नंबर मिल गया है। लेकिन नंबर सही था और अब वह मुझसे बात कर रहा था। फोन चूंकि मैंने बहुत सुबह किया था इसलिए मैं उस कोमल आवाज़ वाली लड़की को उसकी पत्नी समझ बैठी। आखिर पिछले दस सालों में उसने कभी शादी कर ही ली होगी। काम-धंधा जम जाने के बाद लड़कों को घर बसाना ही चाहिए। कल की छोटी सी मुलाकात में वह अपने बारे में मुझे कितना बता सकता था?

'नहीं, नहीं, वह मेरी पत्नी नहीं है, वह तो निशा है, मेरे साथ फ़्लैट शेअर कर रही है, मेरे ही यूनिट में है।'

'ओह, मैं समझी कि ....'

'जो भी लड़की तुम मेरे घर में देखोगी, उसे मेरी बीवी समझ लोगी? यार, तुम बहुत दकियानूसी हो।'

उसकी आवाज़ में तल्खी ऐसे थी जैसे उसका पाला किसी अनपढ़ गंवार से पड़ गया हो। यह थी ही सरासर अनपढ़ता कि किसी भी भद्र पुरुष को किसी भी भद्र महिला के साथ देखो तो पति-पत्नी समझ बैठो। आजतक मैं जैसे किसी दड़बे में बंद थी। आज खुली हवा में निकली हूँ तो दुनिया का रंग ही बदला हुआ है। असल में लोग जितना जान लेते हैं, उतना ही पर्याप्त समझ कर आगे जानना छोड़ देते हैं। मैं भी उन्हीं लोगों में से एक थी। दुनिया बहुत बड़ी है, प्रियंका प्रसाद, किसी के यूं अचानक मिल जाने से उसे छोटी मत समझो।

'शादी भी की थी गलती से,' वह मुझे फोन पर बता रहा था, 'तुम्ही बताओ, कोई ऐसी बीवी हम फिल्म वालों के साथ चल सकती है जो हर घड़ी पूछताछ करती रहे, शक-शुबहा करती रहे, नाज़-नखरा करती रहे?'
'तो क्या तुमने उसे छोड़ दिया?'

'गलत। लड़की चाहे प्रेमिका हो या पत्नी, मैं उसे छोड़ने के कतई पक्ष में नहीं हूँ। अब कोई मुझे ही छोड़ जाए तो मैं क्या करूं?'
 
भई वाह ! मैंने मन ही मन उसे दाद दी। क्या बेचारों वाला अंदाज़ है? अपने ढंग से ईमानदार होने की कोशिश हर कोई करना चाहता है। अपने तईं बन्दा पूरी तरह सही है। दुनिया ही न समझे तो दोष दुनिया का। आखिर दस साल बम्बई के थपेड़ों में जिया है। पार लगने की कलाएं तो सीखनी ही थीं। डूबने थोड़े ही आया था। कहा मैंने यह, 'दिलेर, तुम्हें शादी करनी ही नहीं चाहिए थी। मुझे तो शुरू में ही लग गया था कि तुम शादी के लिए नहीं बने हो।' यह कहते हुए मैं यह सोच रही थी कि किसी मनचले के साथ वक्त तो काटा जा सकता है, ज़िन्दगी नहीं।

'हाँ, वरना तुम न कर लेती मुझसे शादी?'

'मज़ाक छोडो। तुम इतने नासमझ तो नहीं थे कि तुम्हारी शादी गलती से हो जाए?'

'फंस गया था दब्बू, फंस गया था।'

'माता-पिता ने फंसाया था?' मैं जानती थी कि वह अपने माता-पिता का एकलौता पुत्र था और करोड़ों की जायदाद का वारिस। तीन लड़कियों के बाद पैदा हुआ वह बेटा माता-पिटा की ढलती उम्र की सन्तान था, जिसके युवावस्था में कदम रखते-रखते माता-पिता हिलती हुई गर्दन और कांपती हुई टांगों वाली उम्र में प्रवेश कर चुके थे। उनकी आँखों में अब एक ही सपना था लेकिन उनके सपने को पूरा करने वाला उनका एकलौता पुत्र अपने अलग सपनों की एक दुनिया बसा चुका था जिसमें अभिनय था, नाटक था, सिनेमा था, माता-पिता भी थे लेकिन उनके सपनों को पूरा करने के लिए वह ज़िम्मेदार नहीं था। फोन पर उसने बताया कि उसके माता-पिता अब नहीं रहे, कुछ वर्ष पूर्व उनका देहांत हो चुका था और अब, उसके शब्दों में, वह 'अनाथ' था जिसे 'सहारों की ज़रुरत' पड़ती रहती थी। मैंने अफ़सोस प्रकट किया और पूछा कि आजकल उसकी पत्नी कहाँ है?

'सारी बातें फोन पर ही पूछ लोगी? मिलने पर करने के लिए कोई बात नहीं छोडोगी?'

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उस दिन मिलने पर बात करने का न वक्त था, न माहौल। वह मुझे चौपाटी की चाट खिलाने ले गया था। साथ में निशा, बोस और घोष तो थे ही, सबसे आश्चर्यजनक बात यह कि जूली भी थी जो खासी चहक रही थी। बोस उसकी यूनिट का कैमरामैन था और घोष पटकथा लेखक। निशा उसकी सहायक थी। संदीप ने खास घोषणा की कि 'उस दिन की चाट पार्टी प्रियंका जी की वजह से है।'

अभिनय के क्षेत्र में उसके अनुसार उसका चेहरा-मोहरा तो ठीक था पर बम्बई के सितारों की दुनिया में नहीं चला और हीरो से नीचे कुछ बनने का सवाल ही नहीं था। जैसे उडि जहाज़ को पंछी पुनि जहाज़ पे आवे, वैसे ही फिल्मों से अलग कुछ करने के लिए वह सोच ही नहीं सकता था। वीडिओ फिल्मों का दौर शुरू हो चूका था। वीडिओ फिल्म के निर्माण में जो उसने हाथ डाला तो उसे पीछे देखने की ज़रुरत महसूस नहीं हुई। उसकी वीडिओ फिल्मों की मार्केट देश से अधिक विदेशों में थी।

वह जो बनना चाहता था और नहीं बन सका था, उसका उसे अफ़सोस नहीं था। वह जो न बनना चाहते हुए भी बन गया था, उससे वह खुश था। उसके अनुसार, उसकी ज़िन्दगी अच्छी थी। 'बस मस्त रहो, गिला-शिकवा किसी से नहीं। जो छूट गया सो छूट गया, जो मिल गया सो मिल गया।'

चाट खाकर हम उसके ऑफिस आ गए थे। शाम गहराने लगी थी लेकिन उसके यहाँ अभी भी गहमागहमी थी। उसने अपने यूनिट के लोगों से जिस तरह मेरा परिचय कराया, उससे मैं बहुत ही ज्यादा संकोच में भर आई थी। 'यह प्रियंका जी हैं। हमारी नई फिल्म के गीत लिख रही हैं। अब हमारी हर फिल्म के गीत यही लिखेंगी।' मैंने घबराहट में कुछ कहने के लिए उसकी ओर देखा तो उसने मेरा हाथ अपने हाथों में लेकर यूं दबाया कि लोग समझें, वह मेरा स्वागत कर रहा है और मैं समझूं कि मुझे चुप रहना है, इस समय कुछ नहीं बोलना। दस साल पहले वह कैसा भोला नादान हुआ करता था। दस साल की अवधि यूं अपने आप में कुछ भी नहीं हुआ करती लेकिन उसमें घोर तब्दीली लाई थी।

जूली अब मेरे पास खड़ी थी और मुझे तोलती-सी नज़रों से देखती हुई पूछ रही थी, 'तो तुम संदीप की ज़िन्दगी में आई पहली लड़की हो?' मुझे ऐसा पूछना बहुत अपमानजनक लगा। तभी निशा की हंसती, लहराती आवाज़ मेरे कानों में पड़ी, 'जूली को भ्रम है कि वह आखिरी है।'

घटिया। एकदम घटिया। इस अंदाज़ में बात करते हैं ये लोग? खुल्लम खुल्ला? सबसे अधिक क्रोध मुझे संदीप पर ही आया। ड्रामेबाज़। मैंने कब कहा कि मैं फिल्मों में गीत लिखने का शौक रखती हूँ? उसकी फिल्म के गीत लिखूंगी? फरेबी कहीं का। जूली को काट रहा है मेरे कंधे पर बन्दूक रख कर।

मैंने अपने को जूली की नज़रों से मुक्त किया और अलग से एक कुर्सी पर बैठे सिगरटें फूंकते घोष के पास चली गई। घोष एक गंभीर किस्म का लड़का था जो बात कम करता था और आहिस्ता बोलता था। फिर वह पटकथा लेखक था। उसके साथ चूंकि लेखक शब्द जुड़ा था इसलिए उसके पास बैठना मुझे उस वक्त सुविधाजनक प्रतीत हुआ। 'किसी की बात का बुरा मत मानिए। यहाँ सब लोग अच्छे हैं। किसी के मन में कोई कलुष नहीं है। जूली का उद्देश्य आपका अपमान करना नहीं था। वह मन की बुरी नहीं है। बस ज़रा खुला बोलती है। हम सब एक परिवार की भाँति ही तो हैं,' घोष ने कहा।

तभी एक अन्य लड़की की ओर मेरा ध्यान गया, लम्बी, छरहरी, गोरी, फैशनेबल। यूं फैशनेबल यहाँ सभी लडकियां थीं। यह लड़की कुछ ख़ास ढंग से सभ्य नज़र आ रही थी। पहले दिन भी मैंने इसे यहाँ देखा था लेकिन किसी ने परिचय नहीं कराया था। मेरा उसकी ओर ध्यान गया तो घोष ने उसे बुला कर परिचय कराया। वह सीमा थी। उसने दिल्ली विश्विद्यालय से अंग्रेजी में एम ए किया था और पूना फिल्म इंस्टिच्यूट  से अभिनय में प्रथम आई थी। यूं एम ए करते ही उसे एअर होस्टेस की नौकरी मिल गई थी लेकिन दो-तीन महीने तक हवाई उड़ाने भरने के बाद उसके मन की उड़ाने उसे हीरोइन बनने के ख्याब दिखाने लगीं और अभिनय कोर्स में प्रथम आने के बाद तो उसे विश्वास हो गया था कि अब फीचर फिल्मों में वह हीरोइन के रूप में परदे पर छा जाएगी और एक दिन सिर्फ वह होगी सबसे आगे। अब फीचर फिल्मों तो क्या, वीडिओ फिल्मों तक में उसे नौकरानी से लेकर बहन तक के रोल ही मिल रहे थे। मन को समझाने के लिए कहा करती थी कि अभिनय तो अभिनय है, रोल चाहे नायिका का हो या नौकरानी का। फिल्मों में संघर्ष करते उसे आठ-दस साल हो गए थे, दो-चार साल और देखेगी। यदि तब भी कुछ काम नहीं बना यानि उसे कोई बड़ा स्मरणीय रोल नहीं मिला तो इस लाइन को छोड़ देगी और शादी करके घर बसाएगी। सीमा ने बताया था। सीमा की उम्र का हिसाब लगाने बैठो तो पैंतीस-छत्तीस से क्या कम होगी लेकिन चाहे कोई हज़ार शर्त लगा ले, फिर भी पच्चीस से आगे उसकी उम्र का अंदाजा नहीं लगा सकता।

थोड़ी देर की बातचीत में ही मेरे, घोष और सीमा के बीच कुछ ऐसा तालमेल हो गया कि हम लोग अपने-अपने घर लौटने के लिए एक साथ लोकल ट्रेन से जाने का कार्यक्रम बनाने लगे। तीनों का घर आगे-पीछे एक ही रूट पर था। उस ऑफिस से रेलवे स्टशन इतना दूर नहीं था कि अच्छा साथ हो तो बातें करते, टहलते हुए न जाया जा सके। संदीप ने सुना तो आग्रह करने लगा कि हम ज़रा देर और रुक जाएं, वह हम तीनों को ही छोड़  देगा। लेकिन उस दिन हमने भी ट्रेन से जाने की ठान ली और सब को बाय बाय, टा टा करके ऑफिस से निकल पड़े। पीछे से संदीप की शोख आवाज़ सुनाई दी, 'यारों, मुझे अकेला किस के सहारे छोड़ चले?'

हमने पीछे मुड़ कर देखा, जूली 'मेरे' कह कर संदीप से लिपट गई थी।

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उस दिन 'हौलिडे इन' में एक फ़िल्मी पार्टी थी। मैं सीमा के साथ गई थी। घोष वहीँ मिल गया था। उस तीन सौ, चार सौ की भीड़ में अन्य कोई व्यक्ति ऐसा नहीं था जिससे मैं परिचित होऊँ। हालांकि मैं मेज़बान तक को नहीं जानती थी। कुछ फ़िल्मी चेहरों को मैं पहचानती भर थाई। बिन बुलाए मेहमान की भांति मैं जाना नहीं चाहती थी। सीमा ने घोष से कहा था, 'घोष दादा, प्रियंका जी को बताइए, हमारे फिल्म सर्कल में ऐसी औपचारिकता चलती है क्या?'

घोष ने मुझसे कहा, 'प्रियंका दी, आपका चलना आपके हित में रहेगा वहाँ बड़े-बड़े प्रोड्यूसरों से मुलाकात होगी। हो सकता है, आपको किसी बड़ी फिल्म में गीत लिखने का अवसर मिल जाए। फ़िल्मी दुनिया में सब चांस पर निर्भर करता है।'

'घोष दा, मैं गीत लिखती ही नहीं। संदीप ने उस दिन मज़ाक में कहा होगा। मैं कविता लिखती हूँ। मैंने आज तक कोई गीत भजन नहीं लिखा।'

'तो आपसे लिखवा लेंगे। आप चलिए तो,' घोष ने कहा तो सीमा ने पुनः आग्रह किया, 'प्रियंका जी, पार्टी में हमारे साथ आने पर आपको अफ़सोस नहीं होगा, यह मेरा दावा। आपका नए-नए लोगों से परिचय होगा। परिचय कहीं न कहीं काम आते ही हैं।' परिचय काम आना, फ़िल्मी जगत का एक ऐसा नुस्खा था जिसे सीमा और घोष आजमाए हुए थे। 'मुझे कंपनी देने के लिए ही चलिए,' सीमा ने कहा।

यह मुझे बाद में धीरे-धीरे पता चला था कि सीमा फिल्मों में आने के बावजूद फिल्मों जैसी नहीं थी। न बहुत शोख चंचल, न बहुत खुली डुली। उसे इस तरह की पार्टियों में आने-जाने के लिए प्रायः किसी लड़की के साथ की दरकार रहती थी। वह बहुत दबी घुटी नहीं थी पर संतुलित थी। लड़कों से हंसी मज़ाक करती थी पर एक दूरी रख कर। उसकी पोशाकें आधुनिक अवश्य होती थीं पर भड़काऊ नहीं। उसका मेकअप आकर्षक होता था पर सस्ता नहीं। उसकी भाषा शिष्ट होती थी। उसकी किसी भी चाल-ढाल में कभी अश्लीलता नज़र नहीं आई। अब वह ऐसी थी तो चाहे कितनी भी खूबसूरत या प्रतिभाशाली हो, नौकरानी या बहन के रोल से आगे कैसे जा सकती थी? सीमा ने एक-दो नामी निर्माताओं के बारे में स्वयं बताया था कि वे उसे इंस्टिच्यूट से निकलते ही हीरोइन का रोल देने के लिए तैयार थे लेकिन उसने उनका 'निमंत्रण' स्वीकार नहीं किया। कई प्रोड्यूसरों के पास वह काम मांगने गई थी लेकिन नायिका का रोल देने से पूर्व हर प्रोड्यूसर उसके साथ सिटिंग करना चाहता था और वह चाहती थी कि उसके फोटो और अभिनीत फ़िल्में देख कर निर्णय लिया जाए। अपने घोर संघर्षशील दिनों में उसने ऊब कर यह तक सोचा था कि किसी एक निर्माता के हाथों में अपना नसीब सौंप दे लेकिन इस बात की क्या गारंटी थी कि उसे मुख्य भूमिका मिल ही जाएगी? उसने अनेक लडकियां इस उम्मीद में लीक से उतारते देखी थीं। सीमा कहा करती थी कि यह सिरे से मर्दों की दुनिया है। यहाँ स्त्री का जितना शोषण होता है, किसी और क्षेत्र में नहीं। फिल्म लाइन में आकर भी आदर्शों और उसूलों के खोल में लिपटी हुई सीमा किसी अच्छे रोल के काबिल भले ही हो, इस लाइन के काबिल कतई नहीं थी। उसे देख कर मैं मन में हमेशा उस पर तरस खाती थी कि बेचारी कहाँ फंस गई। एअर होस्टेस की नौकरी में लगी होती तो अब तक किसी पायलट से शादी करके परांठे और पुलाव बनाने में प्रवीणता हासिल कर ली होती। फिल्मों की चमक-धमक की चपेट में उसने क्या पाया था? न पैसा, न प्यार और न फ़िल्में ही। यहाँ तक कि पार्टियों में जाने की हिम्मत तक नहीं।

मेरे मना करने के बावजूद उन दोनों ने मेरा परिचय वहाँ गीत लेखिका के रूप में ही करवाया था। 'नई आई हैं।' जैसे कि मैं भारत की नहीं, विदेश से आई थी। 'संदीप जी की वीडिओ फिल्म के लिए गीत लिख रही हैं।'

सचमुच यह झूठों की दुनिया है। कौन छानबीन करने आएगा कि मैंने गीत लिखे या नहीं। बस, प्रचार करते रहो। बहुत सी चीज़ें केवल प्रचार तक सीमित रह जाती हैं यहाँ, अस्तित्व में कभी नहीं आतीं।

एक बुजुर्ग सज्जन थे। कुछ अधिक पीए हुए थे, इसलिए सजग रूप से सज्जन थे। पूछने लगे, 'आप ग़ज़लें भी लिखती हैं?'

'हाँ, हाँ, लिखती हैं,' मेरे कुछ कहने से पूर्व मेरा असिस्टेंट बना घोष बोला।

'आप जानती हैं, आजकल गजलों का क्रेज़ है,' सज्जन पुरुष बता रहे थे, 'नताशा गोखले, भई अपनी नताशा गोखले, प्लेबैक सिंगर, अपनी गजलों का एक कैसेट बनवाना चाहती हैं .... मुझ नाचीज़ को चुना है उन्होंने संगीत देने और गजलों का चुनाव करने के लिए .....'

वह 'नाचीज़' फ़िल्मी दुनिया के प्रसिद्द संगीतकार सुधाकर थे, घोष ने बताया था।

'अब नताशा जी तो नताशा जी .... कहती हैं, 'मैं वो गजलें गाना चाहती हूँ जो लगे कि किसी नारी ह्रदय की ही आवाज़ हैं।' आज तक ग़ज़लें ज़्यादातर शायरों ने ही लिखी हैं, शायराओं ने नहीं। कई भाव ऐसे होते हैं जो केवल पुरुष के भाव होते हैं, जिन्हें केवल पुरुष ही अभिव्यक्त कर सकता है और कई भाव केवल स्त्री के भाव होते हैं। .... आप समझ रही हैं न? मसलन अमीर कज़लबाश की एक ग़ज़ल का यह टुकड़ा देखिए ....' आगे उन्होंने तरन्नुम में सुनाया,
तुमसे मुमकिन हो तो बालों में सजा लो मुझ को
शाख से टूटने वाला हूँ संभालो मुझ को।
तरन्नुम में शेर सुना चुकने के बाद बोले, 'अब आप ही बताइए, यह किसी शायर के दिल की आवाज़ है या शायरा के दिल की? क्या कोई लड़की किसी लड़के से कहेगी कि तुम फूल को अपने बालों में सजा लो? लडकियां ही सजाती हैं बालों में फूल। शायद आप मेरा मतलब समझ रही हैं। तो आप कोई ऐसी ग़ज़ल दीजिए ....' उन्होंने मुझे अपना विजिटिंग कार्ड दिया।

उसी समय सीमा मेरी बांह पकड़ कर उनसे 'अभी मिलते हैं' कह कर मुझे वहाँ से हटा ले गई। यह मेरे जीवन का पहला अवसर था जब मैं, फ़िल्में न देखने की शौक़ीन मैं, फ़िल्मी पत्रिकाओं को न पढने की शौक़ीन मैं शौक से हिमा शालिनी, चन्द्र कपूर, सुरेखा, विजयाप्रदा, सुराज कुमार,  वसीरुद्दीन शाह और न जाने किस किस को निहार रही थी। भावविभोर।

तभी देखा, निशा और बोस एक-दूसरे की कमर में हाथ डाले चले आ रहे हैं। मुझे अजीब सा लगा। निशा फ़्लैट संदीप के साथ शेअर कर रही है, हाथ बोस की कमर में डाले है। बहुत घपले हैं यहाँ। संदीप से कुछ कहूं तो फिर दकियानूसी कहलाऊँ। जाने दो।

निशा ने बड़े जोर की 'हाय' के साथ मुझे गले से लगाया। बोस हलकी सी 'हाय' कह कर भीड़ में गुम हो गया। निशा ने मुझे एक ओर ले जाकर हमदर्द दोस्त की तरह पूछा, 'तुम सीमा के साथ यहाँ आई हो?'

'हाँ, क्यों?'

'यूं ही,' कह कर वह भी भीड़ में चली गई और मैं सोचती रह गई कि आखिर उसके इस 'यूं ही' का अभिप्राय क्या था?

उस महफ़िल में मैंने एक बहुत बड़ी बात सोची। सोचने में क्या है, कुछ भी सोच लो। शेखचिल्लियों की तरह सोचते रहो। तो मैंने सोचा, यदि खुदा-ना-खास्ता भगवान की बुद्धि फिर जाए और वह मेरे घर रुपयों की बारिश कर दे और इतनी दौलत पाकर यदि खुदा-ना-खास्ता मेरी बुद्धि फिर जाए और मैं कोई फिल्म बनाने का निश्चय कर लूं (संभानाओं से कभी परहेज़ नहीं करना चाहिए, कभी भी कुछ भी हो सकता है) तो निश्चित रूप से उसमें हीरोइन सीमा होगी। हीरोइन सोची थी तो हीरो के बारे में सोचना भी लाज़मी था। जिस फिल्म में हीरोइन सीमा होगी, उसमें हीरो कौन होना चाहिए? सोचने में क्या नुकसान है? हीरो संदीप को ही होना चाहिए।

लो, मैंने संदीप के बारे में सोचा और संदीप हाज़िर हुआ।

'बहुत लम्बी उम्र है तुम्हारी।'

लेकिन आज तो परेशानी में आधी रह गई।'

'क्यों? क्या हुआ?'

'मैं तुम्हे फोन कर-कर के परेशान कि आखिर तुम गई कहाँ? मैं तुम्हें यहाँ लाना चाहता था ....'

'मैं तो यहीं हूँ ....'
'अरे हाँ, तुम तो यहीं हो ....'

तभी एक 'मेड फॉर ईच अदर कपल' हमारे पास से गुज़रा और गुज़रते-गुज़रते ठिठक कर वहीँ खड़ा हो गया। संदीप ने तपाक से युवती के गाल पर चुम्बन दिया और 'हेलो डार्लिंग, कैसी हो' कहने के साथ ही युवक से हाथ मिलाया।

'कैसे हो संदीप? क्या चल रहा है?' युवक बोला।

'सब ठीक। मेरी अगली फिल्म के लिए कोई नया चेहरा नज़र में हो तो बताओ।'

'ज़रूर। परसों शाम तुम 'पृथ्वी' में थे। मैं तुमसे मिलना चाहता था, पर तुम बिजी थे।'

'यह सब तो चलता ही रहता है यार, तुम आ जाते।'

'हम दोनों चाहते हैं कि मामला जल्दी निबट जाए,' युवक ने युवती की ओर देख कर कहा, 'वी आर रीयली सीरिअस।'
'ओ के दोस्त, तुम जो पेपर्स लाओगे, मैं साइन कर दूंगा। मैं भी मुक्त होना चाहता हूँ।'

'मिलते हैं फिर,' कह कर युवक और युवती चलने लगे तो संदीप युवती से बोला, 'ऐ, यू आर स्टिल माय वाइफ़। कम, आय वॉन्ट तो गिव यू अ गुडबाय किस,' और खुद बढ़ कर उसके दूसरे गाल पर चुम्बन जड़ दिया, 'नाओ गो एंड एन्जॉय विद माय ब्लेसिंग्स।'

मेरे लिए यह एक ऐसा तमाशा था जो दुनिया के किसी भी हिस्से में, किन्हीं भी लोगों के बीच, किसी भी हालत में होना ही नहीं चाहिए।

खुद को संभालने की कोशिश में संदीप लडखडाता नज़र आ रहा था। मैंने तब जाना कि वह नशे में धुत्त था। मैं, सीमा और घोष पार्टी को बीच में छोड़ कर संदीप को पकड़ कर बाहर ले आए। 'यू नो, शी इज स्टिल माय वाइफ़,' संदीप ने फिर कहा और कार तक आने में घोष के कंधे पर बेहोश हो गया।

हम तीनों ने मिल कर उसे कार की पिछली सीट पर लिटाया। मैं उसके पास बैठी। सीमा और घोष आगे बैठे। घोष ने गाडी ड्राइव की। संदीप को उसके घर तक पहुँचाना ज़रूरी था। मेरा दिल दहला हुआ था। एक भोले मासूम चेहरे पर जैसे किसी ने भरी सभा में थूक दिया था। मैंने उस बेहोश चेहरे को उठा कर उठा कर अपनी गोद में रख लिया।

संदीप के और मेरे बीच एक अजीब सा तंतु था। पास होकर भी बहुत दूर, दूर होकर भी बहुत पास। कुछ न होते भी सब कुछ, सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं। सच, कैसे समझ में न आने वाले सम्बन्ध बन जाते हैं। कभी लगे, बुनियाद है नहीं, महल कई मंजिला खड़ा है। कभी लगे, बुनियाद बहुत मज़बूत है, महल कभी बनेगा ही नहीं। महल की चिन्ता ही नहीं। महल की इच्छा ही नहीं। न कुछ पाने के लिए दौडधूप, न कुछ खोने पर चीख-पुकार। न ईर्ष्या-द्वेष, न मन का क्लेश। न कोई मारामारी, न एक-दूसरे पर बलिहारी। अगर इतने पर भी इसे कोई रिश्ता कहते हैं तो क्या इस रिश्ते को सचमुच कोई नाम दिया जा सकता है? क्या इसीलिए वह गुनगुनाया करता था कि प्यार को प्यार ही रहने दें, कोई नाम न दें? लेकिन प्यार तो उसका और बहुतों से है।

संदीप के घर यद्यपि नौकर था, फिर भी मैंने और घोष ने वह रात संदीप के सिरहाने काटने का विचार किया। नैतिकता का तकाजा था। हम सब एक परिवार के समान थे तो परिवार के मुखिया को ही असहाय स्थिति में अकेला कैसे छोड़ दें?

'कोई बात नहीं  आप लोग आराम से घर जाइए। मैं सब संभाल लूँगा साहब तो रोज़ ही इतनी पीते हैं। आज कोई नई बात तो है नहीं।' नौकर के आश्वासन पर हम तीनों टैक्सी लेकर अपने-अपने घर रवाना हुए।

उस रात मैं सो नहीं पाई। मेरा मन रह-रह कर मेरे अल्हड़ दिनों में लौटता रहा। मेरे दिलेर का यह हश्र? वह मेरा पागल प्रेमी आज दिशाहीन होकर यूं भटकता हुआ? लोगों को दकियानूसी कहने वाला दरियादिल दीवाना आज ज़िन्दगी की दौड़ में यूं पीछे? सफल फिल्मों के निर्माता की खुद की ज़िन्दगी की फिल्म का यह दुखांत? मुझे नींद आती तो कैसे आती?

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मुझे, निशा और जूली को एक संगीत के कार्यक्रम में जाना था। पहले हमारे साथ संदीप भी जाने वाला था लेकिन ऐन मौके पर 'मेरा मूड नहीं है' कह कर उसने अपना प्रोग्राम बदल दिया था पर हमें वही वहाँ छोड़ कर आने वाला था। पाकिस्तान से एक ग़ज़ल गायक बम्बई आए हुए थे। उन्हीं की ग़ज़लें सुनने का कार्यक्रम किसी संगीत प्रेमी ने अपने घर की खुली छत पर रखा था। सुनने के लिए अपने सगे-सम्बन्धी, मित्र-मुलाहजा यानि लगभग पचास लोग बुलाए थे। मुझे उसी दिन पता चला की बम्बई के मकानों में इतनी बड़ी छतें भी होती हैं।

प्रोग्राम रात दस बजे शुरू होना था। उस समय सिर्फ सात बजे थे। तीन घंटे पहले संदीप ने सबको क्यों बुलाया था? सब में सिर्फ मैं, जूली और निशा ही शामिल थे। बाकी सब लोग कहाँ थे, इसका मुझे क्या पता? वैसे भी वह एक राष्ट्रीय छुट्टी का दिन था।

'यार, तुम मीनमेख मत निकाला करो। आज हम आवारागर्दी करेंगे,' संदीप ने मुझसे कहा।

'कहाँ?' पूछने वाली मैं ही थी। जूली और निशा को तो जैसे सब बातें बिना पूछे पता होती थीं।

'सड़कों पर।'

तो सड़कों पर आवारागर्दी करने के लिए कार में आइस बौक्स और गिलास रखे गए। जौनीवौकर ब्लैक लेबल और डनहिल इंटरनेशनल रखी गई। टिंड बुडवाइज़र और टिंड कोकाकोला रखे गए। प्लास्टिक की प्लेटें और चम्मच रखे गए। फिशफिंगर्स और तली हुई मूंगफली के लिफाफे रखे गए। और चिकन बिरयानी का कैसेरोल रखा गया।

गोपियों में कान्हा बने, गाडी चलाते संदीप के मुंह में मूंगफली डालने और गिलास लगाने की ज़िम्मेदारी उसके पास बैठी जूली की थी। जूली और संदीप ब्लैक लेबल ले रहे थे, मैं कोकाकोला, निशा के ना-ना करते संदीप ने बुडवाईजर का टिन गिलास में उंडेल कर उसे दे दिया था और कहा था, 'बीअर में क्या है?'

'निशा तो बनती है। मैंने इसे खुद सब कुछ पीते अपनी आँखों से देखा है। इस समय नखरा दिखा रही है,' जूली ने कहा।

'नखरा नहीं जूली, तुझे पता है, बोस को पसंद नहीं है, वह खुद नहीं पीता, उसे पता चलेगा तो ....'

'यार, तुम बोस से अभी से इतना डरती हो। शादी के बाद तो तुम उसके चरण धो-धो कर पीओगी। सुधर जाओ, निशा, सुधर जाओ,' यह संदीप था।

'विमेन लिब के ज़माने में ऐसी गुलामी ठीक नहीं,' जूली ने कहा।

संदीप ने जैसे समस्या का हल सुझाते हुए कहा, 'हम चारों में से कोई बताने वाला है बोस को? नहीं न? तो चलो, जो मन है, वह पीओ।'

निशा जैसे निश्चिन्त हो गई और बीअर का गिलास तुरंत खाली कर जूली के हाथ में पकड़ा दिया कि जो उसका मन हो, वह दे दे। जूली तो वही देने वाली थी जो वह खुद ले रही थी।

मुझे हैरानी निशा के पीने से नहीं हुई, हुई उसकी दोहरी नैतिकता से। यहाँ अपने मन पर किसी का वश नहीं था। यहाँ मन और तन को जैसे सबने खुला छोड़ा हुआ था। इनकी नज़रों में सब कुछ सही था, गलत कुछ नहीं। सबने जैसे फेंका हुआ था खुद को मंझधार में। अब यह लहरों का धर्म, चाहे डुबाएं, चाहे पार लगाएं।

'और तेज़ .... और तेज़ ....' जूली उछलती हुई ताली बजाती हुई कह रही थी और संदीप एक्सेलरेटर पर पैर दबाता जा रहा था। हम उड़े चले जा रहे थे। गाड़ी दाएं-बाएं बचाती हिचकोले खाती उड़ रही थी। अरे, कोई तो रोको उसे। रोके कौन? सब मस्ती में थे।

'संदीप, गाड़ी आहिस्ता चलाओ,' रोकते-रोकते भी मेरे मुंह से चीख निकल गई। मेरी चीख के साथ गाड़ी एक झटके से रुक गई।

'देखो, नशे में आदमी ज्यादा संभल कर गाड़ी चलाता है। तुम इतना क्यों डर गईं? कोई एक्सीडेंट थोड़े ही हो जाता। सालों से गाड़ी चला रहा हूँ, यार, एक्सपर्ट हूँ। मुझ पर भरोसा रखो। मी संभालो एवरी थिंग,' संदीप ने मुझे समझाया तो जूली ने बुरा सा मुंह बना कर कहा, 'कितनी गैर रोमैंटिक हैं यह तुम्हारी प्रियंका जी।'

सचमुच,  मैं उस ग्रुप में अनफिट थी। मुझे रोना आ गया। मैंने आँखों पर दुपट्टा रख लिया। जूली की आवाज़ मेरे कानों में फिर पड़ी, 'जो इंसान स्पीड से घबराए, समझो, उसका यूथ ख़त्म हो रहा है। ज्यादा से ज्यादा क्या हो जाता? मर ही जाते न? मरने से क्या डरना?'

अजीब बात कही जूली ने। मरने का डर किसे था? पर यूं अगर सड़क पर आवारागर्दी करते हुए खुलेआम दिलेर के साथ मर जाऊं तो मेरा तो बेडा ही गर्क है।  'मुफ्त हुए बदनाम सांवरिया तेरे लिए' वाली बात हो जाए। कहाँ मैं इतनी बड़ी कवयित्री, कहाँ यह आवारा छोकरा? और जहाँ तक यूथ यानि यौवन का प्रश्न है, तो जूली, यूथ यानि यौवन का आनंद स्लो स्पीड यानि धीमी रफ़्तार से लो तो अधिक देर तक लिया जा सकता है। जितना तीव्र गति से तुम भागोगी, उतनी ही जल्दी थक जाओगी। मेरा मन घुमड़ रहा था पर मुंह से आवाज़ नहीं निकल रही थी। मैं सचमुच इन चक्करों के काबिल नहीं थी। मेरे दब्बूपन पर तरस खाओ, दिलेर, मुझे मेरे घर छोड़ दो।

छत पर संगीत की महफ़िल जमी थी। मंच पर ग़ज़ल गायक हारमोनियम लिए विराजमान थे। साथ में तबला वादक बैठे थे। ग़ज़ल गायक का कठ मधुर था और ग़ज़लों का चुनाव सराहनीय।

यहाँ जूली का एक नया ही रूप देखने को मिला। उसके हाव-भाव बड़ी सति-साध्वी औरतों की तरह हो गए। उसने साडी के पल्लू से सिर ढक् लिया और मंच के पास बैठे कार्यक्रम के समृद्ध आयोजक को शरमाई-शरमाई दृष्टि से देखने लगी। कभी साडी के किनारों से पांवों के पंजे ढकती, कभी साडी का पल्लू मोढोँ पर खींचती। असल में इन आयोजक महोदय ने ही जूली को उसके मित्रों यानि हमारे सहित आमंत्रित किया था। आयोजक महोदय सभ्य समाज में जाने जाने वाले गंभीर किस्म के सुदर्शन गृहस्थ थे, जो, मुझे निशा से पता चला कि जूली के साथ किसी संभावित प्रेम सम्बन्ध में बड़ी ईमानदारी से लेकिन डर-डर कर कदम रख रहे थे। जूली संदीप के और इनके बीच किस तरह तारतम्य बैठाए थी, यह मैंने निशा से पूछना उचित नहीं समझा। जूली और आयोजक महोदय की चर्चा भी दोबारा कभी निशा की जुबान पर नहीं आई।

तो उस दिन जूली का यह रूप देख कर मेरे मन में संदीप के लिए सहानुभूति जागी। एक तो बेचारा बीवी के दुखों का मारा, ऊपर से प्रेमिका की यह घोर गद्दारी। क्या उसे आगाह करूं जूली के लिए?

घोष ने कभी एक पते की बात बताई थी कि अपने को पचड़ों से दूर रखो, किसी पचड़े में मत पड़ो। घोष का कहना थी कि उसने अपनी आँखों से इस दुनिया में (फ़िल्मी दुनिया से ही उसका अभिप्राय रहा होगा?) ऐसी-ऐसी अनहोनियाँ देखी हैं, जिन्हें अगर वह उजागर करने लगे तो खून खराबा हो जाए। और सबसे पहले तो खून उसी का हो। उसने समझाया था कि बुराई को देखना तो यहाँ मजबूरी है, लेकिन अपनी जुबान पर अधिकार हमारा है, इसे क्यों खोलें? घोष कहा करता था कि ऐसी बात नहीं कि फ़िल्मी दुनिया के सारे लोग गंदे हैं। सीमा को ही देख लो। और उसे ही देख लो। दा और दी के बिना बात नहीं करता। उसकी सुशील पत्नी कलकत्ता के एक स्कूल में पढ़ाती थी और वह बम्बई में कलम घिसाई कर रहा था। इतनी आमदनी न अकेले पत्नी की थी, न उसकी कि दूसरा आदमी काम छोड़ दे। घोष पहले कलकत्ता में ही बंगला फिल्मों के संवाद लिखा करता था। हिन्दी फिल्मों में अवसर अधिक थे इसलिए किस्मत आजमाई के लिए बम्बई आ गया था। हिन्दी भाषा न आने पर भी कोई दिक्कत नहीं थी क्योंकि हिन्दी फिल्मों की पटकथाएं अंग्रेजी में ही लिखी जाती थीं। छटे-छमाहे पत्नी के पास जाता था लेकिन मजाल है कि उसकी बम्बई की अकेली ज़िन्दगी पर कोई एक छोटी सी ऊँगली भी उठा दे। चिट्ठियों के सहारे गुज़ारे कर रहा था, फिर भी संतुष्ट था।

'और फिर प्रियंका जी, गन्दगी कहाँ नहीं है?' एक बार घोष ने कहा था, 'स्त्री का शोषण कहाँ नहीं है? एक तरह से तो ये फ़िल्मी दुनिया की खराब लगने वाली लडकियां अच्छी ही हैं। शोषण का जवाब शोषण से देना तो जानती हैं। जब पुरुष अपना काम निकल जाने पर लड़की को दूध में से मक्खी की तरह निकल कर बाहर फेंक सकता है तो क्यों न लड़की भी अपना काम निकालने के लिए पुरुषों को मूर्ख बनाए?'

उस दिन गजलों का कार्यक्रम समाप्त होने पर वही सुदर्शन सौम्य गृहस्थ आयोजक हम तीनों को अपनी गाड़ी में छोड़ने आए थे। कार्यक्रम सुबह चार बजे समाप्त हुआ था। अब दो घंटे में तो सवेरा होने ही वाला था। निशा ने आग्रह किया, क्यों न मैं उसी के घर उतर जाऊं?

मुझे और निशा को उतार कर आयोजक जूली के साथ आगे चले गए थे। जूली के घर या कहीं और, इसकी जानकारी न मुझे थी, न निशा को।

मैं निशा के घर गई यानि उसी फ़्लैट में जो वह संदीप के साथ शेअर कर रही थी। मेरी ज़िन्दगी का एक और आश्चर्य यहाँ मेरे सामने आया, जब मुझे पता चला कि संदीप के साथ उसके कमरे में वह लड़की थी जो उसकी नई फिल्म में मुख्य भूमिका निभा रही थी। क्या इसीलिए उसने ऐन मौके पर संगीत के कार्यक्रम में न जाने का बहाना किया था? या जूली के साथ उसकी कोई मिली भगत थी? बहुत गोलमाल है भई यहाँ तो। चल खुसरो घर आपने।

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बम्बई की बहिश्त में प्रवेश करो तो फिल्मों की शूटिंग देखने का शगल स्वाभाविक है। तो एक दिन निशा ले चली मुझे शूटिंग दिखाने। मैं उस हीरो को अपनी आँखों के सामने देख कर निहाल हो गई जिसकी कोई फिल्म मैंने कभी बचपन में देखी थी और उस पर इतना मोहित हुई थी कि किसी पत्रिका से उसका चित्र काट कर पुस्तक में रख लिया था, जिसके लिए माँ से मुझे सिर्फ डांट ही नहीं, मार भी पड़ी थी। अब हीरो के बुढाए हुए चेहरे पर मेकअप की गहरी परतें थीं और बगल में एक कमसिन हीरोइन। जोड़ा वास्तविक ज़िन्दगी में असफल होता पर फिल्म में जम जाएगा। हीरो का एक डुप्लीकेट भी वहीँ था, मिलती-जुलती शक्ल के अलावा हाथ को लटका कर और आवाज़ को लहरा कर बात करने की कला में निपुण। निशा ने बताया की यह मारधाड़ के सीन के वक्त काम आएगा। अपने असल की ज्यादा से ज्यादा नक़ल कर सके, इसीलिए उसे गदगद होकर निहार रहा था।

उस डुप्लीकेट को देख कर मुझे याद आया कि एक बार सीमा मुझे एक फिल्म दिखने ले गई थी। कहती थी, उसने उस फिल्म में अभिनय किया है। हाउस फुल था। फिल्म ज़रूर अच्छी होगी। हमारी चूंकि पहले से बुकिंग नहीं थी, इसलिए हाउसफुल का बोर्ड देख कर मैं निराश हुई लेकिन सीमा को उस सिनेमा हॉल का मालिक, मैनेजर सब जानते थे, इसलिए टिकट मिल ही जाने थे। सीमा मुझे लेकर सीधे मालिक के कमरे में घुस गई। पहचान भरी मुस्कान से सीमा का स्वागत हुआ। फिल्म के बारे में दर्शकों की प्रतिक्रिया पर एकाध वाक्य बोले गए। फिर हमारे सामने दो टिकट रख कर मालिक ने सीमा से कहा कि इनके इतने पैसे दे दीजिए। सीमा ने पैसे दिए, टिकट लिए और हम सिनेमा हॉल में प्रविष्ट हुए। मुझे हैरानी यही हुई कि सीमा जैसी अभिनेत्री, मालिक की परिचित, उसी फिल्म में अभिनय करने वाली से भी मालिक ने दो टिकटों के पैसे धरा लिए।

'तुम जानती नहीं इन व्यापारियों को,' सीमा ने कहा था, 'एक-एक पैसे को दांत से दबा कर रखेंगे। वैसे भी मुझ पर कोई रियायत नहीं करता। अभी और कोई होती, लटकों-झटकों में दो-चार बातें करती तो उसे यह दो क्या, चार टिकट मुफ्त में थमाता और साथ में कोकाकोला भी पिलाता। पर छोडिए प्रियंका जी, हमें सस्तेपन से किसी की इनायत नहीं बटोरनी। हम अपनी फकीरी में भी बादशाह हैं।'

मेरी नज़रों में सीमा सचमुच सराहनीय थी। क्यों नहीं संदीप ही उसे किसी वीडिओ फिल्म में हीरोइन का रोल देता? कहूँगी संदीप से। लेकिन जब मैंने संदीप के सम्मुख अपना सुझाव रखा, तो उसने इन शब्दों में उड़ा दिया, 'ओह ! सीमा और हीरोइन? वह ठंडी लड़की और हीरोइन? तुम अपना दिमाग इन सब बातों में मत फंसाओ दब्बू, तुम्हें इस लाइन की समझ नहीं है।'

मैं और सीमा वह फिल्म देख रहे थे जिसमे उसने अभिनय किया था। फिल्म निकलती जा रही थी और सीमा उसमें कहीं नज़र नहीं आ रही थी। सीमा ने मेरी जिज्ञासा शांत की यह कह कर, 'मेरी एंट्री इंटरवल के एकदम बाद है।'

इंटरवल के बाद वह दिखाई दी, सफ़ेद साडी, सफ़ेद ब्लाउज, सफ़ेद स्कार्फ में, एक नर्स बनी, रोगी को इंजेक्शन देती हुई। उसने एक संवाद भी बोला, 'तुम फ़िक्र मत करो, जल्दी ठीक हो जाओगे।' और बस।

फिल्म ख़त्म होने पर आ रही थी और उसका कहीं अता-पता नहीं था। तभी एक काली चादर में सिर से पैर तक लिपटी हुई, होठों तक मुंह ढके, अधखुले होठों से टूटा हुआ दांत झलकाती हुई फिल्म की नायिका फिल्म के अंतिम दृश्य में दिखाई दी, जिसमे उसे टूटा हुआ दांत झलकाते हुए हीरो के कंधे पर सिर रख देना था और वह शॉट फ्रीज़ होकर फिल्म का अंत बन जाना था। तो सीमा ने बताया कि काली चादर में लिपटी हुई वह थी, हीरोइन की डुप्लीकेट। हीरोइन असली ज़िन्दगी में विवाह करके विदेश सिधार चुकी थी। अंतिम दृश्य फिल्माना रह गया था। सीमा का कद और टूटा हुआ दांत हीरोइन के कद और टूटे हुए दांत के सामान थे, इसलिए उसे हीरोइन की डुप्लीकेट बनना पड़ा।उसकी बात सुन कर मेरे मन में किसी फिल्म की यह पंक्ति सस्वर हो उठी, 'क्या-क्या न सहे हमने सितम आपकी खातिर।'

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मुझे बम्बई छोड़े अरसा हो गया था। कभी-कभी घोष का पत्र आ जाता था। अन्य किसी ने पत्र-व्यवहार की परम्परा शुरू नहीं की। मेरे मन में भी ऐसी इच्छा ने जन्म नहीं लिया क्योंकि अब ऐसा नया या अनदेखा क्या था जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती थी।

एक दिन अचानक घोष का पत्र पाकर मैं आश्चर्यचकित रह गई। घोष ने मुख्य बात तो यही बताने के लिए पत्र लिखा था कि अब उसे बड़ी फिल्मों के ऑफ़र मिलने लगे हैं और उसने अपनी पत्नी की कलकत्ता की अध्यापकी छुडवा कर उसे अपने पास बम्बई बुला लिया है। घोष मेहनती लड़का था। उसे एक न एक दिन चमकना ही था। समर्थ हो जाने पर पत्नी को साथ रखना ही था। मुझे ख़ुशी हुई कि बिछड़ा हुआ हंसों का जोड़ा सब्र का मीठा फल भोग रहां था।

घोष ने और भी बातें लिखी थीं। मसलन, 'निशा और बोस की शादी हो गई।' इसकी आशा की ही जा सकती थी।

'जूली ने संदीप से इस तरह कन्नी काटी कि व्यावसायिक स्तर पर भी उससे अलग हो गई। आयोजक महोदय ने उसे एक फ़्लैट खरीद दिया और वह पुरानी ज़िन्दगी की कालिख को धोने के लिए सिर को साडी के पल्लू से ढकने लगी।' जूली जो न करे, वह थोडा। इसमें भला आश्चर्य क्या?

'सीमा ऐसी गायब हुई कि नज़र ही नहीं आई। शायद नई दुनिया बसा चुकी थी और उसमे पुराने किसी सन्दर्भ की छाया तक नहीं चाहती थी।' सीमा ऐसा कहा ही करती थी। यह तो एक न एक दिन होना ही था, इसमें आश्चर्य क्या?

मुझे आश्चर्य था तो केवल एक बात का कि घोष ने लिखा था कि 'संदीप की गोद में अब एक बच्चा हुआ करता है और हर पार्टी में अब उसके साथ एक ही महिला हुआ करती है, जो उसकी पत्नी कहलाती है।'

ज़िन्दगी की कहानियों के ऐसे सुखान्त किसे अच्छे नहीं लगेंगे? चाहे वे बिना आश्चर्य के हों या आश्चर्य के साथ?

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