Sunday, 28 July 2013

ग़ज़ल 30

ग़ज़ल 30

मेरे मीत कहाँ खोए तुम, तुम बिन रूखा सब संसार
भूल गए कसमे-वादे सब, याद नहीं कोई झन्कार।

सब कुछ सूना-सूना था कि तुमने शोर किया संगीन
रूह से रूह का मेल कराया, बरसा दी थी नेह-फुहार।

मन का यह सलग्न रुझान, तुम हो मेरे चारों ओर
जैसे तुम जन्मों के साथी, मैं करती आदर-सत्कार।

शब्द तुम्हारे सुनने को कि मैं कब से चुपचाप खड़ी
कानों में रस घोलो तुम कि मैं सदियों से हूँ बीमार।

कब होगी बरसात यहाँ कि कब बदलेगा मौसम यह
कि तुम जंगल को रोशन करने को लोगे कब अवतार।

यह कैसा सन्देह साथी कि यह कैसी दुविधा में तुम
मन से मन का मेल करो कि सहज प्रेम का हो संचार।

सिर्फ तुम्हारे हंसने से सब कुछ हो जाएगा आसान
हंसी-ठहाके गूँज उठें, और नहीं कुछ भी दरकार।

छोडो सब लड़ना-वड़ना अब प्रीत-मिलन की बात करो
मन मस्ती में झूम उठे कि त्यौहारों के बिन त्यौहार।

बार-बार कुछ टूट-टूट कर बार-बार जुड़ भी जाता है
यह सम्बन्ध कमाया हमने, यह है रिश्तों का विस्तार।

भावनाओं की अभिव्यक्ति में शब्दों का जो जाल बुना
अंतर्मन तक उतरा मेरे तेरा यह मनमोहक प्यार।

Friday, 26 July 2013

याद तहज़ीब से करे Kavita 157

याद तहज़ीब से करे

कितनी मुश्किल से मनाया
हमने इस दिल को
कि तुम्हें याद तो करे
पर तहजीब से करे.

तुमने अनदेखा किया
जब भी मुझे प्रियवर
कि दिल में मेरे जज़्बात
कुछ अजीब से मरे.

तुमने जो चित्र खींचा था
धुंधला गया है वह
कि जिसने जो करना है
अब तरतीब से करे.

अनचाहे भावों को अब
भटकना नहीं यहाँ
कि कोई नहीं मिलता
कभी नसीब से परे.

गंध का नामो-निशाँ
ढूंढे न मिलेगा कभी
कि पुष्प चाहे कितना
फिर करीब से झरे.

बिखरी पड़ी हैं मंदिरों में
ढेरों दुआएं
कि बददुआ में कोई बस
एक गरीब से डरे.

Thursday, 25 July 2013

फिर से शुरू करें Kavita 156

फिर से शुरू करें

एक जो हँसने को सहारा था
वह मैंने तोड़ दिया
एक जो जीने को सहारा था
वह तुमने तोड़ दिया.

हँसे बिना रह लूँगी मैं
तुम जीये बिना कैसे रहोगे?
जीयेंगे तभी तो हँसेंगे
तुम जीते, मैं हँसती.

तुम्हें जीना नहीं आता
मुझे हँसना नहीं आता
मैं तुम्हें जीना सिखाती
तुम मुझे हँसना सिखाते.

मैं जीना सिखा रही थी
पर तुम बेखबर थे
तुमने हँसना सिखाना चाहा
मैंने ध्यान नहीं दिया.

अब फिर से शुरू करें
शुरू से ही शुरू करें
जीना तुम्हारे लिए ज़रूरी है
हँसना मेरे लिए ज़रूरी है.

तर्क से परे Kavita 155

तर्क से परे

तुम्हारा अंक गणित तर्क से परे है.
तुमने मुझे दिए सौ में से सौ अंक
फिर भी फेल कर दिया
विचित्र निर्णायक हो तुम
अपने ही निर्णय के विरुद्ध चले गए?

तुमने मुझे स्वीकारा था
इसीलिए तो नकारना पड़ा
छोड़ा उसे ही जाता है
जिसे अपना चुके हो कभी.

कैसा प्रणय था तुम्हारा
भूलने में एक दिन न लगा?
किसी भी स्पर्श ने तुम्हें झकझोरा नहीं?
प्यार की कोई लपट तुम्हें झुलसा नहीं गई?
पत्थर के बने थे क्या
जिस पर आग-पानी का कोई असर नहीं होता?

मेरा जो था, पूजा-अर्चना था
जैसे मैं स्वप्न में थी
आँख खुलने पर लगा
जैसे सदियाँ बीत चुकी हों
आँख खुलते-खुलते इतना गहरा गया था रंग.

तुम्हारा जो था, गाली-बदहाली बन कर अवतरित हुआ
तुम खुद जाकर खड़े हो गए कटघरे में
पर सजा का प्रावधान मेरे हाथ में नहीं था.

Sunday, 21 July 2013

उम्र बेकार Kavita 154

उम्र बेकार

यह जीवन प्रमाण है
कि हमने इसे जीया ही नहीं
और क्या सबूत दें
अपनी सारी उम्र बेकार होने का?

कल-कल बहता हुआ झरना था
सायँ-सायँ हवा में थी
व्यर्थ बार-बार लगता रहा
किसी के क़दमों की आहट थी.

रेत का महल था
अतीत का खंडहर था
अनुमान ही अनुमान थे
अधर में लटका हुआ घर था.

प्रमाद में प्रपंच था
भरोसे में साज़िश थी
मृगतृष्णा में आस थी
रोज़-रोज़ बढती हुई प्यास थी.

बागों में हरियाली नहीं
फल और फूल का नामोनिशान नहीं
झरते हुए पीले पत्ते थे
मौसमों की मार थी.

साँसों का आना और जाना था
जीने का तो बस बहाना था
कहीं कोई गंतव्य नहीं
हर मोड़ के बाद बंद दरवाज़ा था.

Friday, 19 July 2013

ग़ज़ल 29

ग़ज़ल 29

तुम्हारी याद में तिल-तिल के हम मर गए होते
न तुम मिलते हमें तो सच में हम तर गए होते।

तुम्ही ने स्वप्न दिखाए, तुम्ही ने स्वप्न को तोड़ा
अगर हमदर्द तुम होते तो ज़ख़्म भर गए होते।

ज़रा सा ध्यान देते तुम कभी जो भूल कर खुद को
कि कितने प्यार के पल-छिन यहाँ सँवर गए होते।

तुम्हें अंदाज़ ही नहीं कि क्या होता है टूटना
अगर होता तो खुद-ब-खुद शाख-से झर गए होते।

कि अहसास से बंजर न होता जो तुम्हारा दिल
मेरे जज़्बात से तुम खेलने से डर गए होते।

खड़े हैं रास्ते पर कब से यूं ही इंतज़ार में
हमें जो अक्ल होती क्यों न अपने घर गए होते।

Wednesday, 17 July 2013

ग़ज़ल 28

ग़ज़ल 28

लापता इस शहर में खुद का पता नहीं हमें
ढूंढ कर लाएं कहाँ से खो गए उस वक़्त को।

सिरफिरा वह था या मैं कुछ समझ आता नहीं
आग से अब दूर रखो खौलते इस रक्त को।

कोई शुभाशीष अब मिल नहीं पाएगी हमें
द्वार से मन्दिर के लौटा दिया है भक्त को।

झूठ की बैसाखियों में जान होती ही नहीं
व्यर्थ समझा कि सहारा मिल गया परित्यक्त को।

कि समझना सच उसे जो सच कभी था ही नहीं
खुल चुके हैं राज़ सब कि क्या छुपाना व्यक्त को।

कहने की थी बात कि हम प्यार करते थे कभी
था भुलावा या कि झूठ सहना था आसक्त को।

हम खुली किताब की मानिंद तेरे सामने
पढ़ सको तो पढ़ लो मन के इस अभिव्यक्त को।

Monday, 15 July 2013

आत्मालाप Kavita 153

आत्मालाप

मैं गूंगे-बहरों की दुनिया में रह रही हूँ।
मैं आराम से बोली
किसी ने नहीं सुना।
मैं चीखी-चिल्लाई
किसी तक मेरी आवाज़ नहीं पहुंची।
कोई मुझसे कुछ नहीं कहता
किसी को बोलना नहीं आता।
यह गूंगे-बहरों का शहर है।

कहीं पढ़ा था
गूंगे-बहरों पर राज करना सरल होता है
लेकिन मैं कष्ट से गुज़र रही हूँ।
कोई तो मुझे सुनो
कोई तो कुछ बोलो
लेकिन लोग चुप हैं।
कभी-कभी मुस्कुरा देते हैं।
उनके चेहरे पर सहमापन नहीं है
संतुष्टि है।
बाहर की कोई हवा उनके भीतर नहीं जाती।
उनके मन में कोई द्वन्द नहीं उठता।
उन्हें नहीं पता
अगले क्षण क्या होने वाला है।
उन्हें नहीं पता
उनके साथ क्या घटने वाला है।

वे बवंडर की आवाज़ नहीं सुन पाएंगे
बहरापन उनके लिए सौभाग्य है।
वे किसी भी गाली का जवाब नहीं दे पाएंगे
जब सुनेंगे ही नहीं तो बोलेंगे कैसे?
मैं चीख-चीख कर पागल हो रही हूँ
पर वे मज़े में हैं
बेअसर
बेलिहाज
बेशरम।

Sunday, 14 July 2013

यह मुझे क्या हुआ? Kavita 152

यह मुझे क्या हुआ?

वह मर रहा था
उसका जीवित शरीर आग में जल रहा था।
कैसे मर जाते हैं लोग जीते जी?
कैसे रुक जाता है जीवन चलते-चलते?
उसके बाद सिर्फ उम्र बढ़ती है
अहसास ख़त्म होने लगते हैं
ज्ञान का दायरा सिमट जाता है
जीते जी आदमी कैसे मर जाता है?

मैंने उसे जिलाना चाहा
मौत से उसे बचाना चाहा
मैं उसके झुलसे शरीर को आग से बाहर निकाल लाई
मैंने प्रेम की नमी से उसके ताप को सोखना चाहा
मैंने उसके शीतल मृतप्राय अस्तित्व
और घटते हुए अहसास
और सीमित ज्ञान के साथ तारतम्य बैठाया
पर वह बार-बार लड़खड़ाया।

यह मुझे क्या हुआ?
यह मेरी साँसों को क्या हुआ?
मेरी साँस रुक-रुक कर आने लगी
मैं बदहवासी में चिल्लाने लगी
प्यास प्यास प्यास
उफ़ ! मैं कब से प्यासी थी।
मैं किसी अंधे कूए में उतर गई
उसे जिलाने की कोशिश में मैं खुद मर गई।

Friday, 12 July 2013

मेरे आत्मन ! Kavita 151

मेरे आत्मन !

मेरे आत्मन !
मेरी हँसी तुम्हारी साँसों में अटकी रह गई
मैंने हँसना छोड़ दिया है
तुम आराम से साँस ले लो।
तुम्हारी हँसी से मैं रोज़ खिलखिलाती हूँ
तुम यूं ही हँसते रहना
तुम्हारी हँसी से मैं जीवन पाती हूँ।
मेरे साथी !
मेरी बातें तुम्हारे मस्तिष्क में उलझ गई हैं
मैंने शब्द कविताओं को सौंप दिए हैं
अब मेरा मौन भी तुमसे कुछ नहीं कहेगा।
तुम्हारी बातें छंद बन कर मेरे भीतर उतरती हैं
तुम यूं ही बोलते रहना
तुम्हारी चुप्पी से डर लगता है।
मेरे प्रियतम !
मेरा स्पर्श तुम्हारे दिल को सहमा गया है
मैंने अपने हाथों को काट दिया है
तुम भी संकल्प की नदी में नहा लो।
मेरी आँखें भी अब तुम्हें नहीं छूएँगी
मेरी जिह्वा पर कोई संकेत नहीं होगा
स्मृतियों को जीने का हक़ हम दोनों का है।
मेरे मीत !
अब तो गा लो दोस्ती के गीत
कहाँ छुप कर बैठे हो?
किन कंदराओं में खो गए हो?
देखो, मौसम में कोई मदमस्ती नहीं है
बहारें संतुलित हैं, नज़ारे संकुचित हैं
कोई भी फुहार हमारे मन को नहीं भिगोएगी।
मेरे सहयोगी !
हमने जो काम साथ-साथ करने थे
वे अधूरे रह गए हैं, आओ, उन्हें पूरा कर लें
मर चुके बहुत, आओ, थोड़ी देर जी लें।
मेरी प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं
मेंरी महत्वाकांक्षाएं अब वो नहीं हैं
मैंने सपने देखने बंद कर दिए हैं।

Thursday, 11 July 2013

उम्मीद Kavita 150

उम्मीद

तुम एक भोले बच्चे के समान भीड़ में चल रहे थे
तुम्हारे मन में जिज्ञासा थी
और आँखों में चांचल्य
तुम्हारे पांवों में गति थी
और चाल में अल्हड़पन
तुम्हारे होठों पर प्रार्थना थी
और हाथों में तीर
तुम शिकार करने निकले थे।

तुम तीर चलाने की कला में माहिर नहीं थे
तुम्हें यह भी नहीं पता था कि किसका शिकार करना है
बस, तुम्हें शौक था किसी को भी मार देने का
मार कर शिकार का क्या करोगे
यह भी तुम्हें पता नहीं था।
तुम कुछ कर दिखाना चाहते थे
कुछ ऐसा जो तुम्हारा हुनर समझा जाए
कुछ ऐसा जिससे तुम्हारे होने का पता चले।

अस्तित्व की पहचान का संकट तुम्हारे सामने था
सुखद भावी का सपना तुम्हारी आँखों में था
संभावित विजय का लालित्य तुम्हारे चेहरे पर था
तुम आश्वस्त थे मुक्ति को पाने के लिए
तुम्हारे पाँव की जंजीरें बस अब कटने को थीं
चुप्पियों के बादल छँट जाएँगे
किसी के आशीर्वचन तुम्हारे काम आएँगे
इसी उम्मीद में तुम भीड़ के सहारे बढ़ते चले गए।

निरुत्तर Kavita 149

निरुत्तर

मैंने कहा, दरवाज़ा खोलो
तुमने खोल दिया
मैंने कहा, मैं अन्दर आऊं?
तुमने कहा, आओ
मैंने कहा, अन्दर आकर क्या करूँगी?
तुम सोचने लगे
तुम खुद विपन्न थे
तुम्हारे पास मेरे आतिथ्य के लिए क्या था?

मैंने कहा, चलो, बाहर चलें
तुमने कहा, चलो, चलें
मैंने कहा, बागों की सैर करें
तुमने कहा, हाँ, करें
मैंने कहा, मेरे लिए वह गुलाब तोड़ कर लाओ
तुम ठिठक गए
काँटा चुभने का डर
तुम्हारे माथे की लकीरों में दिख रहा था।

मैंने कहा, आओ, बारिश में नहाएं
तुमने कहा, क्या बात है
मैंने कहा, बूंदों को हथेलियों में इकट्ठा करें
तुमने कहा, वाह वाह
मैंने कहा, अपनी हथेली मेरे होठों से लगाओ
तुम सहम गए
हथेली में भरा हुआ पानी
मेरे होठों को छूने के लिए कब तक प्रतीक्षा करता?

मैंने कहा, मिल कर एक घर बनाएं
तुमने कहा, ज़रूर
मैंने कहा, घर को रंगोली से सजाएं
तुमने कहा, क्या खूब
मैंने कहा, आओ, अब घर के कोनों में सपने बुनें
तुम चिंता में पड़ गए
क्योंकि सपनों में एक सपना
मेरे और तुम्हारे संयुक्त प्यार का भी था।

मैंने कहा, मैं जा रही हूँ
तुमने कहा, जाओ
मैंने कहा, मैं मर रही हूँ
तुमने कहा, मरो
मैंने कहा, मैं तुम पर मर रही हूँ
तुम चुप रहे
कहने को था भी क्या?
एक सिहरता हुआ मर्सिया तुम्हारी आँखों में था।

कोशिश Kavita 148

कोशिश

मैंने पढ़ी हैं बहुत सारी किताबें
मैंने हर जगह से अर्जित किया है ज्ञान
मैं बहुत बुद्धिमान हूँ
मेरे पास दूसरों के हर सवाल का जवाब है
मेरे पास दूसरों की हर उलझन का हल है
मैंने हर तरह की परीक्षा पास की है
मुझे कोई हरा नहीं सकता।

मैंने मन के जंगलों पर विजय पाई है
मैंने सपनों के पहाड़ लाँघे हैं
मैंने पार किए हैं लालसाओं के नदी-नाले
मैंने संयमित किया है पछाड़ें मारता प्रवाह
कोई ऐसी वासना नहीं जिस पर मैं काबू न पा सकूँ
कोई ऐसा खेल नहीं जिसे मैं जीत न सकूँ
मेरी इन्द्रियाँ मेरे वश में हैं।

मेरे पास सकारात्मक शक्ति हैं
मेरे पास ईमानदार भक्ति है
आसक्ति में भी डूबना मुझे आता है
डूब-डूब कर उबरने की कला मालूम है
कालिख में रह कर भी कालिख मुझे छूती नहीं
कोई भी अनचाहा रंग मुझ पर चढ़ता नहीं
चीजें मेरे बीच में से होकर लौट जाती हैं।

पर उसके आगे मेरी हार हुई
उसकी विचित्रता समझ में नहीं आई
वह किस मिट्टी का बना है?
किन रेशों से उसका दिल-दिमाग तना है?
कौन सी धूप-हवा खा कर वह जिंदा है?
जिंदा भी है या भीतर से मरा है?
उसे समझने की कोशिश बेकार गई।

Tuesday, 9 July 2013

रहस्य Kavita 147

रहस्य

कल जो होता है अपना
आज वह बेगाना हो जाता है
दिल और दिमाग आदमी का वही रहता है
फिर भी आदमी बदल जाता है।
मनुष्य के भीतर का परिवर्तन
कभी समझ में न आने वाला रहस्य है।

अभी बारिश होती है
अभी धूप निकल आती है
सूरज निकलने के समय में भी
रात का कोहरा छाया रहता है
सर्दियों में आसमान रात भर रोता है
प्रकृति के दिल में किसका दर्द होता है?

जंगल के फूलों की कहानी भी अलग है
बेचारे जंगल में उग कर मंगल करते हैं
कोई उन्हें अपने कमरे में नहीं सजाता
कोई उन्हें भगवान पर नहीं चढ़ाता
पर रंग तो उनमें भी होते हैं
सजाओ तो कहीं भी सज सकते हैं।

कई फूलों में खुशबू होती है, कईयों में नहीं
ऐसे ही एक ही घर में जन्मे बच्चे भी
एक ही खाद-पानी से सींचे जाते हैं सब
एक ही हवा-धूप खिलाती है सबको
एक सी धरती पर उगते हैं फूल भी, बच्चे भी
फिर कुछ फूलों में खुशबू क्यों नहीं होती?

कल के लिए सँजोते हैं हम सपने
वह कल कभी आता ही नहीं
जिसे हम समझते हैं अपना
वह पास आकर भी खो जाता है
क्यों होने जैसा दिखाई देता है
जो कभी होना ही न हो?

Sunday, 7 July 2013

तुम ही हो Kavita 146

तुम ही हो

तुम ही हो संशय, तुम ही विश्वास हो
तुम ही हो घृणा, तुम ही लगाव हो।

तुम से ही जन्म लेती हैं शंकाएं
तुम पर ही ख़त्म होती हैं आशाएं।

भाव भी तुम हो, अभाव भी तुम
काल भी तुम हो, अकाल भी तुम।

तुम ही हो वेदना, तुम ही संवेदना।
तुम ही संकल्प हो, तुम ही विकल्प हो।

तुम ही हो साधना, तुम ही हो साध्य
तुम ही हो बाधा, तुमने ही हो बाध्य।

तुम न अतीत हो, तुम न भविष्य हो
तुम एक ज़बरदस्त मोह हो निर्मोही।

तुम्हें सोच-सोच कर डूबती हूँ राग में
तुम एकमात्र सबब मेरे विराग में। 

प्रेम का आतंक Kavita 145

प्रेम का आतंक

तुम्हारे प्रेम का आतंक मेरे चारों ओर फैला है
तुम्हारे शब्द धीरे-धीरे मेरी रगों में सिसक रहे हैं
तुम्हारा मुक्त अट्टहास मेरे आंसुओं में बह रहा है
तुम्हारी देह का सुनहरापन मेरी कल्पना में मर रहा है।

तुम मेरे लिए स्थायी देश-काल हो
तुम मेरे लिए कभी न हल होने वाला सवाल हो
तुम मेरे कोई नहीं, फिर भी विद्यमान हो
तुम मेरा कराहता हुआ वर्तमान हो।

तुम में होकर भी मैं तुम में नहीं हूँ
मुझ में होकर भी तुम मुझ में नहीं हो
हम एक दूसरे में से होकर निकल आए हैं
हम अब सिर्फ अभिशप्त साये हैं।

तुम अपनी मानसिक जकड़नों में हो
मैं अपने मृतप्राय प्रलोभन में हूँ
तुम अपनी समाधानहीन उलझनों में हो
मैं अपने लाइलाज सम्मोहन में हूँ।

Friday, 5 July 2013

मैं कहाँ हूँ? Kavita 144

मैं कहाँ हूँ?

मेरे लिए कोई रास्ता क्यों नहीं है?
मंजिल न सही
रास्ता तो हो।
मैं कविताओं में भटक रही हूँ।
कवितायेँ मुझे कहाँ पहुंचाएंगी?
रास्ते भी कहीं नहीं पहुँचाते
सिर्फ मंजिल की उम्मीद में
दूर तक ले जाते हैं।
रास्ते कभी ख़त्म नहीं होते
रास्तों का कोई अंत नहीं होता।
ऐसे ही कविताओं का कोई अंत नहीं है।
तो क्या कविता रास्ता है?
या मंजिल?
मुझे कुछ पता नहीं
बस भटक रही हूँ
कविताओं में भटक रही हूँ
क्या कविता ही वह रास्ता है
जिस पर चल कर मुझे मंजिल तक पहुंचना है?
या कविता मंजिल है?
कुछ पता नहीं
मैं कविता में हो रही हूँ
मैं कविता में बीत रही हूँ
पता नहीं, रास्ते पर हूँ
या कहाँ हूँ?

मेरे प्रिय पात्र : गौतम बुद्ध Kavita 143

मेरे प्रिय पात्र : गौतम बुद्ध

सिद्धार्थ !
तुम सब कुछ छोड़ कर
राजमहल से निकल गए थे
रात के अँधेरे में चुपचाप।
तुम्हारे संतप्त मन पर
गैरों के दुःख का बोझ था
तुम अपनों के दुःख की
कल्पना नहीं कर पाए।
पिता शुद्दोधन
तुम्हें ढूंढने के लिए दर-दर भटकेंगे
यशोधरा
तुम्हें न पाकर दीवारों से सिर फोड़ेगी
बेटा राहुल
पिता के वात्सल्य से वंचित हो कैसे जीएगा?
तुमने कुछ नहीं सोचा
तुम्हारे मन पर
अपनों के दुःख से ज्यादा
दुनिया के मूलभूत दुखों का साया था।
तुम्हारे अपने जब तुम्हारे लिए रोए
तो उनका रोना उनके अपने लिए था
लेकिन तुम अपने लिए नहीं रोए
तुम्हारा रोना संसार के दुखों के लिए था।
तुम व्यक्तिगत नहीं, सार्वजनिक अर्थों में
जीना शुरू हो गए थे
जब तुम घर से निकले थे
भिक्षा का पात्र हाथ में लेकर।
तुमने विजय पाई, गौतम बुद्ध
जब तुम बोधिसत्व को प्राप्त हुए।
लेकिन तुम्हारी असली विजय वह नहीं थी।
नाना प्रकार के रसरंजित भोजनों के आदी
तुम्हारी पहली विजय वह थी
जब तुमने पहली भिक्षा में प्राप्त
भोजन को खाने की हिम्मत की थी
अपने स्वाद को जीता था।
नर्म बिछौनों में सोने के आदी
तुम्हारी पहली विजय वह थी
जब तुम सड़क के जलते पत्थरों पर सोए थे
तुमने सुस्वप्न्मयी निद्रा को जीता था।
ज्ञान-प्राप्ति से बहुत पहले ही
तुम विजयी हो गए थे।
सिद्धार्थ !
तुम सही अर्थों में सिद्ध थे।

Thursday, 4 July 2013

अजब सी कहानी थी Kavita 142

अजब सी कहानी थी

किसी से ना हुई कहन
मौन हो सब किया सहन
कितनी बार मृत्यु हुई
कितनी बार हुए दहन।

अंगार पर तपती रही
जल-जल कर बुझती रही
बुझ-बुझ कर राख हुई
इर्द-गिर्द उडती रही।

कंटकों का कहर था
यहाँ-वहाँ ज़हर था
उजड़ी हुई आस थी
लुटता हुआ शहर था।

कागज़ की नाव थी
चोट खुला घाव थी
अनमने सानिध्य में
झुलसाती छाँव थी।

झूठा साहचर्य था
असली ब्रह्मचर्य था
खेलने को भावनाएं
डूबने को गर्त्य था।

मैत्री का हनन हुआ
भरोसे का छलन हुआ
बात आई-गई हुई
क्षत-विक्षत मन हुआ।

अजब सी कहानी थी
एकदम बेमानी थी
सड़कों का राजा था
महलों की रानी थी।

Wednesday, 3 July 2013

I am in love

I am in love

I am in love.
I want to tell the whole world
that I am in love.

My love is not a worldly affair.
I am too old to be loved by layman.
My man is not from this lousy world
He is away from it.
He is above human
He is Godly
He is my dream man
He lives in my dream.

I am a broken heart.
I am an abandoned soul.
He picked me up
From the garbage of my past
And gave a new meaning
To my left-over life.

He has no face, no body
Still I see his beauty, his youthfulness.
He does not speak to me like others
Still I hear his voice
I can recognize his voice
For he speaks to me
Hours and hours.
I do not touch him
But I feel his touch.
I do not see his physical self
But I always feel him around.
I always feel being seen by him.
I feel his hugs and kisses.

He is nobody
Just nobody for others
But every thing
Just every thing for me.

He is my dream man.
I do not know
how exactly he looks.
He has no figure
He has no shape.
I gave him a figure
I gave him a shape
I created him.

I created his physical self
He is young and handsome.
I created his personality
He is attractive and adorable.
I created his character
He is pure and perfect.
I created a dream man.

You do not get
Persons of your choice
So you have to create them
In your dream.

My dream man is superb
He loves me only.
He doesn't cheat on me.
My dream man is wonderful
He resides in my heart
Still walks on earth with me.
My dream man is unique
Whatever he says
Only I listen, nobody else.

Love is not for everybody.

Love is not for everybody.

Love is not for everybody.
It is for those
who are soft and gentle.

It is for those
who are true and tired.

It is for those
who are sound and sure.

It is for those
who are sincere and selfless.

It is for those
who are alone and alive.

It is for those
who are innocent and novice.

It is for those
who are gloomy and glorious.

Love is not for everybody.

Love is a great thing.

Love is a great thing.

Love is a great thing.

It gives you courage
to fight your loneliness.

It gives you tolerance
to tackle with people.

It gives you strength
to live on your own.

It gives you calmness
to ignore petty losses.

It gives you ignorance
to boast for belongings.

It gives you vision
to leave worldly pleasures.

It gives you opportunity
to talk to God.

Love is a great thing
I am talking to God.

O my love !

O my love !

O my love !
You are not my love
I do not know you.

I love my dream man.
He is a special one
One and only one.

He is not YOU
You can not be HE.

I do not know you
I do not love you
But I am in love.

I have left this world
I don't live here
I don't love any worldly man.

I don't know you
I don't know who you are.

Still I am in love.
I live in my dream world
I love my dream man
I don't love you.

Tuesday, 2 July 2013

ग़ज़ल 27

ग़ज़ल 27

मुझ को मिले नसीब से मेरा नसीब हो गए
तुम दूर जितने भी गए उतने करीब हो गए।

चैन मेरा छीन कर भी चैन से रहे न तुम
दिल की दौलत वार दी लो हम गरीब हो गए।

रातरानी की महक से स्वप्न भी गंधित हुए
ज़िन्दगी देने की धुन में सब सलीब हो गए।

फूल-पत्तों को सजाने की कला आती नहीं
जंगलों में रह के तुम जँगल अज़ीज़ हो गए।

क्या कहूँ, क्या न कहूँ, मन में मचा संघर्ष है
चुप्पियों के बीच तुम कितने अजीब हो गए।

Monday, 1 July 2013

भारतीय संस्कार

भारतीय संस्कार

एक बार गयाना की महिलाओं ने भारत की महिलाओं के सम्बन्ध में एक विचित्र जिज्ञासा प्रकट की (जो हमारे लिए विचित्र है लेकिन उनके लिए सहज) कि भारत में अन्वेड मदर्स (बिन ब्याही माँ) की समस्या का हल क्या है? जब मैंने उन्हें बताया कि भारत में अन्वेड मदर्स जैसी कोई समस्या नहीं है क्योंकि हमारे देश में विवाह से पूर्व संतानोत्पत्ति जायज़ नहीं है, तो उनका अगला दोहरा प्रश्न अत्यंत रोचक था, कि जब भारत में क्वारी लड़कियों को बच्चे पैदा करने की सामाजिक आज्ञा नहीं है तो भी भारत में इतनी आबादी कैसे है? और क्या भारत में युवा लड़के लडकियां आपस में मिलते, प्यार करते नहीं हैं? यदि ऐसा होता है तो उनके बच्चे कैसे नहीं पैदा होते?

भारत की स्थिति पश्चिमीय देशों की स्थिति से एकदम भिन्न है। भारत की आबादी वैसे ही इतनी अधिक है। भारत के युवा लड़के-लडकियाँ आपस में मिलते भी हैं, प्यार भी करते हैं, शारीरिक संबध भी स्थापित करते होंगे, लेकिन बच्चा पैदा होने की स्थिति सामाजिक स्वीकृति न होने के कारण नहीं आने देते। एक औसत लड़की शारीरिक संबंधों को बहुत पवित्र समझती है, और चाहती है, इस बात के लिए प्रयत्नशील भी रहती है कि विवाहोपरांत ही उसके प्रेमी से शारीरिक सम्बन्ध हों। यदि किसी क्वारी लड़की को गर्भ ठहर भी जाए तो गर्भपात कराना ही बेहतर समझा जाता है।

ज़माने का जो दस्तूर हमारे बाप-दादों के ज़माने में था, इस मामले में वही अब तक चला आ रहा है। सामाजिक बदलाव की रफ़्तार इतनी तेज़ नहीं होती। कहीं तो हम संतुष्ट हैं कि हमारे भारतीय संस्कार अब तक बचे हुए हैं। हमारे बच्चे पाश्चात्य संस्कृति में डूब रहे हैं, खानपान, रहन-सहन, पहनना-ओढ़ना, सब पाश्चात्य गति से चल रहा है लेकिन स्त्री-पुरुष संबंधों में अभी भी भारतीय संस्कारों की छाप नज़र आती है, रिश्तों और मान्यताओं में पवित्रता अभी कायम है, क्या यह संतोष की बात नहीं?