Tuesday, 2 July 2013

ग़ज़ल 27

ग़ज़ल 27

मुझ को मिले नसीब से मेरा नसीब हो गए
तुम दूर जितने भी गए उतने करीब हो गए।

चैन मेरा छीन कर भी चैन से रहे न तुम
दिल की दौलत वार दी लो हम गरीब हो गए।

रातरानी की महक से स्वप्न भी गंधित हुए
ज़िन्दगी देने की धुन में सब सलीब हो गए।

फूल-पत्तों को सजाने की कला आती नहीं
जंगलों में रह के तुम जँगल अज़ीज़ हो गए।

क्या कहूँ, क्या न कहूँ, मन में मचा संघर्ष है
चुप्पियों के बीच तुम कितने अजीब हो गए।

1 comment:

  1. प्रेम का कोमल अहसास
    मन को छूती हुई सुंदर अनुभूति
    बेहतरीन
    सादर


    जीवन बचा हुआ है अभी---------

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