Wednesday, 17 July 2013

ग़ज़ल 28

ग़ज़ल 28

लापता इस शहर में खुद का पता नहीं हमें
ढूंढ कर लाएं कहाँ से खो गए उस वक़्त को।

सिरफिरा वह था या मैं कुछ समझ आता नहीं
आग से अब दूर रखो खौलते इस रक्त को।

कोई शुभाशीष अब मिल नहीं पाएगी हमें
द्वार से मन्दिर के लौटा दिया है भक्त को।

झूठ की बैसाखियों में जान होती ही नहीं
व्यर्थ समझा कि सहारा मिल गया परित्यक्त को।

कि समझना सच उसे जो सच कभी था ही नहीं
खुल चुके हैं राज़ सब कि क्या छुपाना व्यक्त को।

कहने की थी बात कि हम प्यार करते थे कभी
था भुलावा या कि झूठ सहना था आसक्त को।

हम खुली किताब की मानिंद तेरे सामने
पढ़ सको तो पढ़ लो मन के इस अभिव्यक्त को।

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