Friday, 19 July 2013

ग़ज़ल 29

ग़ज़ल 29

तुम्हारी याद में तिल-तिल के हम मर गए होते
न तुम मिलते हमें तो सच में हम तर गए होते।

तुम्ही ने स्वप्न दिखाए, तुम्ही ने स्वप्न को तोड़ा
अगर हमदर्द तुम होते तो ज़ख़्म भर गए होते।

ज़रा सा ध्यान देते तुम कभी जो भूल कर खुद को
कि कितने प्यार के पल-छिन यहाँ सँवर गए होते।

तुम्हें अंदाज़ ही नहीं कि क्या होता है टूटना
अगर होता तो खुद-ब-खुद शाख-से झर गए होते।

कि अहसास से बंजर न होता जो तुम्हारा दिल
मेरे जज़्बात से तुम खेलने से डर गए होते।

खड़े हैं रास्ते पर कब से यूं ही इंतज़ार में
हमें जो अक्ल होती क्यों न अपने घर गए होते।

2 comments:

  1. तुम्ही ने स्वप्न दिखाए, तुम्ही ने स्वप्न को तोड़ा
    अगर हमदर्द तुम होते तो ज़ख़्म भर गए होते।-----

    बहुत सुंदर और यथार्थपरक गजल
    बधाई

    आग्रह है मेरे ब्लॉग में भी सम्मलित हों
    केक्ट्स में तभी तो खिलेंगे--------

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  2. tumhe andaaj hi nahi kiya hota tootna...achchi gajal hai

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