Sunday, 28 July 2013

ग़ज़ल 30

ग़ज़ल 30

मेरे मीत कहाँ खोए तुम, तुम बिन रूखा सब संसार
भूल गए कसमे-वादे सब, याद नहीं कोई झन्कार।

सब कुछ सूना-सूना था कि तुमने शोर किया संगीन
रूह से रूह का मेल कराया, बरसा दी थी नेह-फुहार।

मन का यह सलग्न रुझान, तुम हो मेरे चारों ओर
जैसे तुम जन्मों के साथी, मैं करती आदर-सत्कार।

शब्द तुम्हारे सुनने को कि मैं कब से चुपचाप खड़ी
कानों में रस घोलो तुम कि मैं सदियों से हूँ बीमार।

कब होगी बरसात यहाँ कि कब बदलेगा मौसम यह
कि तुम जंगल को रोशन करने को लोगे कब अवतार।

यह कैसा सन्देह साथी कि यह कैसी दुविधा में तुम
मन से मन का मेल करो कि सहज प्रेम का हो संचार।

सिर्फ तुम्हारे हंसने से सब कुछ हो जाएगा आसान
हंसी-ठहाके गूँज उठें, और नहीं कुछ भी दरकार।

छोडो सब लड़ना-वड़ना अब प्रीत-मिलन की बात करो
मन मस्ती में झूम उठे कि त्यौहारों के बिन त्यौहार।

बार-बार कुछ टूट-टूट कर बार-बार जुड़ भी जाता है
यह सम्बन्ध कमाया हमने, यह है रिश्तों का विस्तार।

भावनाओं की अभिव्यक्ति में शब्दों का जो जाल बुना
अंतर्मन तक उतरा मेरे तेरा यह मनमोहक प्यार।

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