Monday, 1 July 2013

भारतीय संस्कार

भारतीय संस्कार

एक बार गयाना की महिलाओं ने भारत की महिलाओं के सम्बन्ध में एक विचित्र जिज्ञासा प्रकट की (जो हमारे लिए विचित्र है लेकिन उनके लिए सहज) कि भारत में अन्वेड मदर्स (बिन ब्याही माँ) की समस्या का हल क्या है? जब मैंने उन्हें बताया कि भारत में अन्वेड मदर्स जैसी कोई समस्या नहीं है क्योंकि हमारे देश में विवाह से पूर्व संतानोत्पत्ति जायज़ नहीं है, तो उनका अगला दोहरा प्रश्न अत्यंत रोचक था, कि जब भारत में क्वारी लड़कियों को बच्चे पैदा करने की सामाजिक आज्ञा नहीं है तो भी भारत में इतनी आबादी कैसे है? और क्या भारत में युवा लड़के लडकियां आपस में मिलते, प्यार करते नहीं हैं? यदि ऐसा होता है तो उनके बच्चे कैसे नहीं पैदा होते?

भारत की स्थिति पश्चिमीय देशों की स्थिति से एकदम भिन्न है। भारत की आबादी वैसे ही इतनी अधिक है। भारत के युवा लड़के-लडकियाँ आपस में मिलते भी हैं, प्यार भी करते हैं, शारीरिक संबध भी स्थापित करते होंगे, लेकिन बच्चा पैदा होने की स्थिति सामाजिक स्वीकृति न होने के कारण नहीं आने देते। एक औसत लड़की शारीरिक संबंधों को बहुत पवित्र समझती है, और चाहती है, इस बात के लिए प्रयत्नशील भी रहती है कि विवाहोपरांत ही उसके प्रेमी से शारीरिक सम्बन्ध हों। यदि किसी क्वारी लड़की को गर्भ ठहर भी जाए तो गर्भपात कराना ही बेहतर समझा जाता है।

ज़माने का जो दस्तूर हमारे बाप-दादों के ज़माने में था, इस मामले में वही अब तक चला आ रहा है। सामाजिक बदलाव की रफ़्तार इतनी तेज़ नहीं होती। कहीं तो हम संतुष्ट हैं कि हमारे भारतीय संस्कार अब तक बचे हुए हैं। हमारे बच्चे पाश्चात्य संस्कृति में डूब रहे हैं, खानपान, रहन-सहन, पहनना-ओढ़ना, सब पाश्चात्य गति से चल रहा है लेकिन स्त्री-पुरुष संबंधों में अभी भी भारतीय संस्कारों की छाप नज़र आती है, रिश्तों और मान्यताओं में पवित्रता अभी कायम है, क्या यह संतोष की बात नहीं?

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