Thursday, 11 July 2013

कोशिश Kavita 148

कोशिश

मैंने पढ़ी हैं बहुत सारी किताबें
मैंने हर जगह से अर्जित किया है ज्ञान
मैं बहुत बुद्धिमान हूँ
मेरे पास दूसरों के हर सवाल का जवाब है
मेरे पास दूसरों की हर उलझन का हल है
मैंने हर तरह की परीक्षा पास की है
मुझे कोई हरा नहीं सकता।

मैंने मन के जंगलों पर विजय पाई है
मैंने सपनों के पहाड़ लाँघे हैं
मैंने पार किए हैं लालसाओं के नदी-नाले
मैंने संयमित किया है पछाड़ें मारता प्रवाह
कोई ऐसी वासना नहीं जिस पर मैं काबू न पा सकूँ
कोई ऐसा खेल नहीं जिसे मैं जीत न सकूँ
मेरी इन्द्रियाँ मेरे वश में हैं।

मेरे पास सकारात्मक शक्ति हैं
मेरे पास ईमानदार भक्ति है
आसक्ति में भी डूबना मुझे आता है
डूब-डूब कर उबरने की कला मालूम है
कालिख में रह कर भी कालिख मुझे छूती नहीं
कोई भी अनचाहा रंग मुझ पर चढ़ता नहीं
चीजें मेरे बीच में से होकर लौट जाती हैं।

पर उसके आगे मेरी हार हुई
उसकी विचित्रता समझ में नहीं आई
वह किस मिट्टी का बना है?
किन रेशों से उसका दिल-दिमाग तना है?
कौन सी धूप-हवा खा कर वह जिंदा है?
जिंदा भी है या भीतर से मरा है?
उसे समझने की कोशिश बेकार गई।

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