Friday, 12 July 2013

मेरे आत्मन ! Kavita 151

मेरे आत्मन !

मेरे आत्मन !
मेरी हँसी तुम्हारी साँसों में अटकी रह गई
मैंने हँसना छोड़ दिया है
तुम आराम से साँस ले लो।
तुम्हारी हँसी से मैं रोज़ खिलखिलाती हूँ
तुम यूं ही हँसते रहना
तुम्हारी हँसी से मैं जीवन पाती हूँ।
मेरे साथी !
मेरी बातें तुम्हारे मस्तिष्क में उलझ गई हैं
मैंने शब्द कविताओं को सौंप दिए हैं
अब मेरा मौन भी तुमसे कुछ नहीं कहेगा।
तुम्हारी बातें छंद बन कर मेरे भीतर उतरती हैं
तुम यूं ही बोलते रहना
तुम्हारी चुप्पी से डर लगता है।
मेरे प्रियतम !
मेरा स्पर्श तुम्हारे दिल को सहमा गया है
मैंने अपने हाथों को काट दिया है
तुम भी संकल्प की नदी में नहा लो।
मेरी आँखें भी अब तुम्हें नहीं छूएँगी
मेरी जिह्वा पर कोई संकेत नहीं होगा
स्मृतियों को जीने का हक़ हम दोनों का है।
मेरे मीत !
अब तो गा लो दोस्ती के गीत
कहाँ छुप कर बैठे हो?
किन कंदराओं में खो गए हो?
देखो, मौसम में कोई मदमस्ती नहीं है
बहारें संतुलित हैं, नज़ारे संकुचित हैं
कोई भी फुहार हमारे मन को नहीं भिगोएगी।
मेरे सहयोगी !
हमने जो काम साथ-साथ करने थे
वे अधूरे रह गए हैं, आओ, उन्हें पूरा कर लें
मर चुके बहुत, आओ, थोड़ी देर जी लें।
मेरी प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं
मेंरी महत्वाकांक्षाएं अब वो नहीं हैं
मैंने सपने देखने बंद कर दिए हैं।

1 comment:

  1. बहुत सुन्दर भाव की सुन्दर अभिव्यक्ति !
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