Sunday, 14 July 2013

यह मुझे क्या हुआ? Kavita 152

यह मुझे क्या हुआ?

वह मर रहा था
उसका जीवित शरीर आग में जल रहा था।
कैसे मर जाते हैं लोग जीते जी?
कैसे रुक जाता है जीवन चलते-चलते?
उसके बाद सिर्फ उम्र बढ़ती है
अहसास ख़त्म होने लगते हैं
ज्ञान का दायरा सिमट जाता है
जीते जी आदमी कैसे मर जाता है?

मैंने उसे जिलाना चाहा
मौत से उसे बचाना चाहा
मैं उसके झुलसे शरीर को आग से बाहर निकाल लाई
मैंने प्रेम की नमी से उसके ताप को सोखना चाहा
मैंने उसके शीतल मृतप्राय अस्तित्व
और घटते हुए अहसास
और सीमित ज्ञान के साथ तारतम्य बैठाया
पर वह बार-बार लड़खड़ाया।

यह मुझे क्या हुआ?
यह मेरी साँसों को क्या हुआ?
मेरी साँस रुक-रुक कर आने लगी
मैं बदहवासी में चिल्लाने लगी
प्यास प्यास प्यास
उफ़ ! मैं कब से प्यासी थी।
मैं किसी अंधे कूए में उतर गई
उसे जिलाने की कोशिश में मैं खुद मर गई।

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