Monday, 15 July 2013

आत्मालाप Kavita 153

आत्मालाप

मैं गूंगे-बहरों की दुनिया में रह रही हूँ।
मैं आराम से बोली
किसी ने नहीं सुना।
मैं चीखी-चिल्लाई
किसी तक मेरी आवाज़ नहीं पहुंची।
कोई मुझसे कुछ नहीं कहता
किसी को बोलना नहीं आता।
यह गूंगे-बहरों का शहर है।

कहीं पढ़ा था
गूंगे-बहरों पर राज करना सरल होता है
लेकिन मैं कष्ट से गुज़र रही हूँ।
कोई तो मुझे सुनो
कोई तो कुछ बोलो
लेकिन लोग चुप हैं।
कभी-कभी मुस्कुरा देते हैं।
उनके चेहरे पर सहमापन नहीं है
संतुष्टि है।
बाहर की कोई हवा उनके भीतर नहीं जाती।
उनके मन में कोई द्वन्द नहीं उठता।
उन्हें नहीं पता
अगले क्षण क्या होने वाला है।
उन्हें नहीं पता
उनके साथ क्या घटने वाला है।

वे बवंडर की आवाज़ नहीं सुन पाएंगे
बहरापन उनके लिए सौभाग्य है।
वे किसी भी गाली का जवाब नहीं दे पाएंगे
जब सुनेंगे ही नहीं तो बोलेंगे कैसे?
मैं चीख-चीख कर पागल हो रही हूँ
पर वे मज़े में हैं
बेअसर
बेलिहाज
बेशरम।

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