Thursday, 11 July 2013

उम्मीद Kavita 150

उम्मीद

तुम एक भोले बच्चे के समान भीड़ में चल रहे थे
तुम्हारे मन में जिज्ञासा थी
और आँखों में चांचल्य
तुम्हारे पांवों में गति थी
और चाल में अल्हड़पन
तुम्हारे होठों पर प्रार्थना थी
और हाथों में तीर
तुम शिकार करने निकले थे।

तुम तीर चलाने की कला में माहिर नहीं थे
तुम्हें यह भी नहीं पता था कि किसका शिकार करना है
बस, तुम्हें शौक था किसी को भी मार देने का
मार कर शिकार का क्या करोगे
यह भी तुम्हें पता नहीं था।
तुम कुछ कर दिखाना चाहते थे
कुछ ऐसा जो तुम्हारा हुनर समझा जाए
कुछ ऐसा जिससे तुम्हारे होने का पता चले।

अस्तित्व की पहचान का संकट तुम्हारे सामने था
सुखद भावी का सपना तुम्हारी आँखों में था
संभावित विजय का लालित्य तुम्हारे चेहरे पर था
तुम आश्वस्त थे मुक्ति को पाने के लिए
तुम्हारे पाँव की जंजीरें बस अब कटने को थीं
चुप्पियों के बादल छँट जाएँगे
किसी के आशीर्वचन तुम्हारे काम आएँगे
इसी उम्मीद में तुम भीड़ के सहारे बढ़ते चले गए।

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