Sunday, 21 July 2013

उम्र बेकार Kavita 154

उम्र बेकार

यह जीवन प्रमाण है
कि हमने इसे जीया ही नहीं
और क्या सबूत दें
अपनी सारी उम्र बेकार होने का?

कल-कल बहता हुआ झरना था
सायँ-सायँ हवा में थी
व्यर्थ बार-बार लगता रहा
किसी के क़दमों की आहट थी.

रेत का महल था
अतीत का खंडहर था
अनुमान ही अनुमान थे
अधर में लटका हुआ घर था.

प्रमाद में प्रपंच था
भरोसे में साज़िश थी
मृगतृष्णा में आस थी
रोज़-रोज़ बढती हुई प्यास थी.

बागों में हरियाली नहीं
फल और फूल का नामोनिशान नहीं
झरते हुए पीले पत्ते थे
मौसमों की मार थी.

साँसों का आना और जाना था
जीने का तो बस बहाना था
कहीं कोई गंतव्य नहीं
हर मोड़ के बाद बंद दरवाज़ा था.

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