Thursday, 25 July 2013

तर्क से परे Kavita 155

तर्क से परे

तुम्हारा अंक गणित तर्क से परे है.
तुमने मुझे दिए सौ में से सौ अंक
फिर भी फेल कर दिया
विचित्र निर्णायक हो तुम
अपने ही निर्णय के विरुद्ध चले गए?

तुमने मुझे स्वीकारा था
इसीलिए तो नकारना पड़ा
छोड़ा उसे ही जाता है
जिसे अपना चुके हो कभी.

कैसा प्रणय था तुम्हारा
भूलने में एक दिन न लगा?
किसी भी स्पर्श ने तुम्हें झकझोरा नहीं?
प्यार की कोई लपट तुम्हें झुलसा नहीं गई?
पत्थर के बने थे क्या
जिस पर आग-पानी का कोई असर नहीं होता?

मेरा जो था, पूजा-अर्चना था
जैसे मैं स्वप्न में थी
आँख खुलने पर लगा
जैसे सदियाँ बीत चुकी हों
आँख खुलते-खुलते इतना गहरा गया था रंग.

तुम्हारा जो था, गाली-बदहाली बन कर अवतरित हुआ
तुम खुद जाकर खड़े हो गए कटघरे में
पर सजा का प्रावधान मेरे हाथ में नहीं था.

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