Thursday, 4 July 2013

अजब सी कहानी थी Kavita 142

अजब सी कहानी थी

किसी से ना हुई कहन
मौन हो सब किया सहन
कितनी बार मृत्यु हुई
कितनी बार हुए दहन।

अंगार पर तपती रही
जल-जल कर बुझती रही
बुझ-बुझ कर राख हुई
इर्द-गिर्द उडती रही।

कंटकों का कहर था
यहाँ-वहाँ ज़हर था
उजड़ी हुई आस थी
लुटता हुआ शहर था।

कागज़ की नाव थी
चोट खुला घाव थी
अनमने सानिध्य में
झुलसाती छाँव थी।

झूठा साहचर्य था
असली ब्रह्मचर्य था
खेलने को भावनाएं
डूबने को गर्त्य था।

मैत्री का हनन हुआ
भरोसे का छलन हुआ
बात आई-गई हुई
क्षत-विक्षत मन हुआ।

अजब सी कहानी थी
एकदम बेमानी थी
सड़कों का राजा था
महलों की रानी थी।

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