Friday, 5 July 2013

मेरे प्रिय पात्र : गौतम बुद्ध Kavita 143

मेरे प्रिय पात्र : गौतम बुद्ध

सिद्धार्थ !
तुम सब कुछ छोड़ कर
राजमहल से निकल गए थे
रात के अँधेरे में चुपचाप।
तुम्हारे संतप्त मन पर
गैरों के दुःख का बोझ था
तुम अपनों के दुःख की
कल्पना नहीं कर पाए।
पिता शुद्दोधन
तुम्हें ढूंढने के लिए दर-दर भटकेंगे
यशोधरा
तुम्हें न पाकर दीवारों से सिर फोड़ेगी
बेटा राहुल
पिता के वात्सल्य से वंचित हो कैसे जीएगा?
तुमने कुछ नहीं सोचा
तुम्हारे मन पर
अपनों के दुःख से ज्यादा
दुनिया के मूलभूत दुखों का साया था।
तुम्हारे अपने जब तुम्हारे लिए रोए
तो उनका रोना उनके अपने लिए था
लेकिन तुम अपने लिए नहीं रोए
तुम्हारा रोना संसार के दुखों के लिए था।
तुम व्यक्तिगत नहीं, सार्वजनिक अर्थों में
जीना शुरू हो गए थे
जब तुम घर से निकले थे
भिक्षा का पात्र हाथ में लेकर।
तुमने विजय पाई, गौतम बुद्ध
जब तुम बोधिसत्व को प्राप्त हुए।
लेकिन तुम्हारी असली विजय वह नहीं थी।
नाना प्रकार के रसरंजित भोजनों के आदी
तुम्हारी पहली विजय वह थी
जब तुमने पहली भिक्षा में प्राप्त
भोजन को खाने की हिम्मत की थी
अपने स्वाद को जीता था।
नर्म बिछौनों में सोने के आदी
तुम्हारी पहली विजय वह थी
जब तुम सड़क के जलते पत्थरों पर सोए थे
तुमने सुस्वप्न्मयी निद्रा को जीता था।
ज्ञान-प्राप्ति से बहुत पहले ही
तुम विजयी हो गए थे।
सिद्धार्थ !
तुम सही अर्थों में सिद्ध थे।

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