Thursday, 11 July 2013

निरुत्तर Kavita 149

निरुत्तर

मैंने कहा, दरवाज़ा खोलो
तुमने खोल दिया
मैंने कहा, मैं अन्दर आऊं?
तुमने कहा, आओ
मैंने कहा, अन्दर आकर क्या करूँगी?
तुम सोचने लगे
तुम खुद विपन्न थे
तुम्हारे पास मेरे आतिथ्य के लिए क्या था?

मैंने कहा, चलो, बाहर चलें
तुमने कहा, चलो, चलें
मैंने कहा, बागों की सैर करें
तुमने कहा, हाँ, करें
मैंने कहा, मेरे लिए वह गुलाब तोड़ कर लाओ
तुम ठिठक गए
काँटा चुभने का डर
तुम्हारे माथे की लकीरों में दिख रहा था।

मैंने कहा, आओ, बारिश में नहाएं
तुमने कहा, क्या बात है
मैंने कहा, बूंदों को हथेलियों में इकट्ठा करें
तुमने कहा, वाह वाह
मैंने कहा, अपनी हथेली मेरे होठों से लगाओ
तुम सहम गए
हथेली में भरा हुआ पानी
मेरे होठों को छूने के लिए कब तक प्रतीक्षा करता?

मैंने कहा, मिल कर एक घर बनाएं
तुमने कहा, ज़रूर
मैंने कहा, घर को रंगोली से सजाएं
तुमने कहा, क्या खूब
मैंने कहा, आओ, अब घर के कोनों में सपने बुनें
तुम चिंता में पड़ गए
क्योंकि सपनों में एक सपना
मेरे और तुम्हारे संयुक्त प्यार का भी था।

मैंने कहा, मैं जा रही हूँ
तुमने कहा, जाओ
मैंने कहा, मैं मर रही हूँ
तुमने कहा, मरो
मैंने कहा, मैं तुम पर मर रही हूँ
तुम चुप रहे
कहने को था भी क्या?
एक सिहरता हुआ मर्सिया तुम्हारी आँखों में था।

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