Sunday, 7 July 2013

प्रेम का आतंक Kavita 145

प्रेम का आतंक

तुम्हारे प्रेम का आतंक मेरे चारों ओर फैला है
तुम्हारे शब्द धीरे-धीरे मेरी रगों में सिसक रहे हैं
तुम्हारा मुक्त अट्टहास मेरे आंसुओं में बह रहा है
तुम्हारी देह का सुनहरापन मेरी कल्पना में मर रहा है।

तुम मेरे लिए स्थायी देश-काल हो
तुम मेरे लिए कभी न हल होने वाला सवाल हो
तुम मेरे कोई नहीं, फिर भी विद्यमान हो
तुम मेरा कराहता हुआ वर्तमान हो।

तुम में होकर भी मैं तुम में नहीं हूँ
मुझ में होकर भी तुम मुझ में नहीं हो
हम एक दूसरे में से होकर निकल आए हैं
हम अब सिर्फ अभिशप्त साये हैं।

तुम अपनी मानसिक जकड़नों में हो
मैं अपने मृतप्राय प्रलोभन में हूँ
तुम अपनी समाधानहीन उलझनों में हो
मैं अपने लाइलाज सम्मोहन में हूँ।

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