Sunday, 7 July 2013

तुम ही हो Kavita 146

तुम ही हो

तुम ही हो संशय, तुम ही विश्वास हो
तुम ही हो घृणा, तुम ही लगाव हो।

तुम से ही जन्म लेती हैं शंकाएं
तुम पर ही ख़त्म होती हैं आशाएं।

भाव भी तुम हो, अभाव भी तुम
काल भी तुम हो, अकाल भी तुम।

तुम ही हो वेदना, तुम ही संवेदना।
तुम ही संकल्प हो, तुम ही विकल्प हो।

तुम ही हो साधना, तुम ही हो साध्य
तुम ही हो बाधा, तुमने ही हो बाध्य।

तुम न अतीत हो, तुम न भविष्य हो
तुम एक ज़बरदस्त मोह हो निर्मोही।

तुम्हें सोच-सोच कर डूबती हूँ राग में
तुम एकमात्र सबब मेरे विराग में। 

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