Friday, 5 July 2013

मैं कहाँ हूँ? Kavita 144

मैं कहाँ हूँ?

मेरे लिए कोई रास्ता क्यों नहीं है?
मंजिल न सही
रास्ता तो हो।
मैं कविताओं में भटक रही हूँ।
कवितायेँ मुझे कहाँ पहुंचाएंगी?
रास्ते भी कहीं नहीं पहुँचाते
सिर्फ मंजिल की उम्मीद में
दूर तक ले जाते हैं।
रास्ते कभी ख़त्म नहीं होते
रास्तों का कोई अंत नहीं होता।
ऐसे ही कविताओं का कोई अंत नहीं है।
तो क्या कविता रास्ता है?
या मंजिल?
मुझे कुछ पता नहीं
बस भटक रही हूँ
कविताओं में भटक रही हूँ
क्या कविता ही वह रास्ता है
जिस पर चल कर मुझे मंजिल तक पहुंचना है?
या कविता मंजिल है?
कुछ पता नहीं
मैं कविता में हो रही हूँ
मैं कविता में बीत रही हूँ
पता नहीं, रास्ते पर हूँ
या कहाँ हूँ?

3 comments:

  1. कल 07/07/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  3. कवि मन को बाखूबी शब्दों में उतारा है ...

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