Tuesday, 9 July 2013

रहस्य Kavita 147

रहस्य

कल जो होता है अपना
आज वह बेगाना हो जाता है
दिल और दिमाग आदमी का वही रहता है
फिर भी आदमी बदल जाता है।
मनुष्य के भीतर का परिवर्तन
कभी समझ में न आने वाला रहस्य है।

अभी बारिश होती है
अभी धूप निकल आती है
सूरज निकलने के समय में भी
रात का कोहरा छाया रहता है
सर्दियों में आसमान रात भर रोता है
प्रकृति के दिल में किसका दर्द होता है?

जंगल के फूलों की कहानी भी अलग है
बेचारे जंगल में उग कर मंगल करते हैं
कोई उन्हें अपने कमरे में नहीं सजाता
कोई उन्हें भगवान पर नहीं चढ़ाता
पर रंग तो उनमें भी होते हैं
सजाओ तो कहीं भी सज सकते हैं।

कई फूलों में खुशबू होती है, कईयों में नहीं
ऐसे ही एक ही घर में जन्मे बच्चे भी
एक ही खाद-पानी से सींचे जाते हैं सब
एक ही हवा-धूप खिलाती है सबको
एक सी धरती पर उगते हैं फूल भी, बच्चे भी
फिर कुछ फूलों में खुशबू क्यों नहीं होती?

कल के लिए सँजोते हैं हम सपने
वह कल कभी आता ही नहीं
जिसे हम समझते हैं अपना
वह पास आकर भी खो जाता है
क्यों होने जैसा दिखाई देता है
जो कभी होना ही न हो?

No comments:

Post a Comment