Wednesday, 28 August 2013

गीता श्री की कहानी

गीता श्री की कहानी

गीता श्री की कहानी, 'कहाँ तक भागोगी' 'जनसत्ता' के 25 अगस्त के अंक में, पढ़ कर अभी तक उबरी नहीं हूँ. क्या कहती है यह कहानी और क्या कहना चाहती है? कहती है यह कि एक हिन्दू लड़की, अपने धर्म से जिसका मोहभंग हो गया है, मुस्लिम बन जाती है, अपना देश छोड़ कर एक मुस्लिम देश की शरण लेती है, दिन भर लड़कियों की हथेलियों पर मेहँदी लगा कर, मेहँदी के बीच में अल्लाह कानाम लिख कर, मुस्लिम धर्म के प्रचार में जुटी रहती है और रात को एक नाईट क्लब में नौकरी करती है. लेखिका को वह एक शिप क्रूज़ पर मिलती है और उसे भी मुस्लिम धर्म ग्रहण करने के लिए उकसाती है. लेखिका कहानी में मात्र दर्शक की भूमिका अदा करती है, ज्यादा से ज्यादा अपने द्वारा रची हुई इस पात्र पर हैरान होती है और उसे अपने देश वापस लौटाने के लिए लेखिका के पास एक ही तर्क है कि अब भारत में भी बियर (डांस) बार खुल रहे हैं, वह लौट सकती है, उसे यहाँ भी काम मिल सकता है, दिन में धर्म-प्रचार, रात को डांस-बार, यह दोहरी ज़िन्दगी का नाटक वह क्यों करे?

मुझे ऐसा लगता है कि लेखिका ने यह कहानी लिखी ज़रूर लेकिन लेखिका ने खुद इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि यह कहानी कहना क्या चाहती है? होता है, बहुत बार ऐसा होता है, लेखक तथ्यों को कहानी में पिरो कर कहानी के बीच से इस तरह गायब हो जाता है कि कहानी का मंतव्य भी पढने वाले खुद ही ढूंढते हैं. अब सुनिए, कहानी क्या कहना चाहती है.... 'मैं भी हिन्दू हूँ, गुजरती हिन्दू, इला बेन. कन्वरटेड मुस्लिम। हिन्दू धर्म से मेरा मोहभंग हो चुका है, वहां किस-किस को साधती? इतने देवी-देवता। इतने पंथ. यहाँ अल्लाह एक है. वहां सुकून नहीं है. आठ साल पहले दुबई आ गई थी. अब मैं फातिमा हूँ. फातिमा। मुझे वहां वापस कभी नहीं जाना। मेरी कहानी फिर कभी. हैरान मत हो. बिना बुर्के का जीवन देख चुकी हूँ. हो सके तो ढक लो. लुट जाओगी, सब की सब.'

इस बात को काटने के लिए लेखिका ने कोई तर्क नहीं दिया। तो क्या कहानी यह कहना चाहती है कि हिन्दू धर्म बकवास है क्योंकि इस धर्म में अनेक देवी-देवता इंसान को कन्फ्यूज़ कर देते हैं कि वह किसे साधे, किसे नहीं? क्या कहानी यह कहना चाहती है कि मुस्लिम संस्कृति अधिक ग्राह्य है? लड़कियों का जीवन बुर्के में लिपट कर अधिक महफूज़ है? क्या आज जो हमारे नेता कह रहे हैं कि लड़कियों द्वारा अपने शरीर को पूरी तरह न ढक पाने के कारण ही बलात्कार जैसी बुराइयां जन्म ले रही हैं, वही यह कहानी भी कह रही है? क्या अपने देश और भारतीय / हिन्दू संस्कृति से भाग कर मुस्लिम धर्म में संरक्षण लेना सराहनीय है? यदि कहानी यही सब कहना चाहती है (जो कि जाहिरा तौर पर ज़ाहिर है) तो क्या इस कहानी के खिलाफ कोई हिन्दू मोर्चा खड़ा हो सकता है जो यह ऐतराज़ उठा सके कि इसमें हिन्दू धर्म की तौहीन हुई है और मुस्लिम धर्म को एक अपवाद के रूप में स्वीकार किया गया है? क्या एक अदद लड़की के अपने धर्म एवं संस्कृति से मिले कटु अनुभवों के आधार पर एक अन्य धर्म को शरणागत धर्म दिखाना उचित है? जबकि लेखिका का यह मकसद कभी नहीं रहा होगा।

अजीब अहसास Kavita167

अजीब अहसास

एक अजीब सा अहसास.... 
एक खुशबू आई
या एक हवा
या एक पर्दा-सा
उसने मुझे ढक लिया चारों तरफ से.
मैं उस खुशबू
उस हवा
उस पर्दे के बीच में बंधी हुई
सुरक्षित।
क्या वे तुम्हारी बाहें थीं?
खुशबू तो वही थी
हवा में चुप्पी भी वही
सुरक्षा का पर्दा भी वही
तुम्हारी बाहों का अहसास भी वही.
सुनो, मुझे यूं ही बँधा रहने दो
मुझे खुलना नहीं
किसी दूसरे अहसास में घुलना नहीं
तुम्हारा रंग काफी है
मेरी बदरंग ज़िन्दगी के लिए.

Monday, 26 August 2013

पुराना राग

पुराना राग

जैसे आठ महीने पहले निर्भया के सामूहिक बलात्कार के बाद हुआ था, उसी तरह नारे लग रहे हैं, मोमबत्तियां जल रही हैं, बलात्कारियों के लिए उम्रकैद, फांसी, बंधियाकरण की मांग उठ रही है, नेता अंट-शंट बयान दे रहे हैं. पर इस सब से होगा क्या? निर्भया पर तो फैसला आज तक नहीं आया.…. अभी टीवी में एक नेता को यह बयान देते हुए सुना कि लड़कियों को ठीक तरह पूरे कपडे पहन कर घर से बाहर निकलना चाहिए। वही पुराना राग. अब पूछे कोई इस अनीतिपूर्ण बयान देने वाले नेता से कि औरत को चाहे कपड़ों में गठरी की तरह लपेट दो, रहेगी तो वह औरत ही. बलात्कारी को मादा शरीर चाहिए। नेता शायद यह कहना चाहते हैं कि औरत जब पूरी तरह कपड़ों में लिपटी होगी तो बलात्कारी पुरुष उसके कपडे उतारने की ज़हमत नहीं उठाएगा, इस तरह वह बलात्कार से बच जाएगी। वाह वाह. शर्मनाक हैं ऐसे नेता और उनके बयान। हर महिला को अपने साथ पिस्टल रखने का कानूनी अधिकार मिलना चाहिए और यह अधिकार भी मिलना चाहिए कि वह अपनी हिफाज़त के लिए किसी भी पुरुष को शूट कर दे और उस पर कोई मुकदमा न चलाया जाए.

(Pulished in Jansatta, Chaupal Column, on 28.08.13)

Sunday, 25 August 2013

मैं कहीं खो गई हूँ Kavita166

मैं कहीं खो गई हूँ

मैं कहीं खो गई हूँ
मुझे नहीं पता
मैं कहाँ खो गई हूँ.

पहले जैसा यहाँ कुछ नहीं है.
पहले मेरे साथ थी मेरी प्यारी अम्मा
अम्मा यानि दादी, मेरी सबसे अपनी.

दादी के ज़माने में
कटोरदान में भरी रहती थी रोटियाँ
अचार के मर्तबान
मिर्च-मसाले वाली सब्जियां
सब्जी न हो तो अचार से खालो
रोटियों की कोई कमी नहीं.

दादी कहा करती थी,
जो ताकत अन्न में है, किसी में नहीं.

मेरा मन कभी ललकता
बाहर की रंगीनियाँ देख कर
दादी समझाती,
देख पराई चूपड़ी क्यों ललचाए जी
रूखी-सूखी खाय के ठंडा पानी पी. 

दादी कहावतों में बात करती थी.
खाने से पहले रोटी का एक टुकड़ा
ज़रूर निकालती थी
न जाने किस के लिए
कभी कुत्ते के लिए, कभी गाय के लिए.
खाती जाती और कहती जाती
भागवान की कमाई में सबका साझा,
जहाँ नीयत, वहाँ बरकत.

बरकतों में पलती हुई मैं
फटे कपड़ों में जब
शीशे के आगे खड़ी होती
मेरे रूप में निखार आ जाता
दादी मेरी बलैयां लेती
मैं किसी राजकुमार के सपनों में खो जाती.

मैं और दादी दो नहीं थे, एक थे
और अकेले काफी थे हँसने के लिए
जीने के लिए.

कभी जो रोने दिया हो मुझे?
कभी जो निकले हों मेरी आँख से आंसू?

दादी गरीब थी इसलिए मैं भी गरीब थी
दादी अमीर होती तो मैं भी अमीर होती.
हम अपनी फकीरी में भी बादशाह हैं-
चढ़ती उम्र का जूनून मुझसे कहलवाता
दादी कहती, बोलना आ गया है तुझे.

फिर मैं पढ़ने लगी, लिखने भी लगी
यानि लिखने-पढ़ने लगी
और खो गई न जाने कौन सी दुनिया में?

अब दादी नहीं है
सिर्फ मैं हूँ और मेरे मन के अँधेरे हैं.
कौन सा देश है यह? कौन सा काल है यह?
पता नहीं।

नहीं हैं अब वह अभावों की महक
मेरे आसपास ऐश्वर्यशाली बंजर है
स्मृतियों की रौनकें हैं
और है एक फ़ालतू सा ख्याल-
यदि मैं भी दादी की तरह गरीब होती
तब भी क्या हँसी मेरे होठों पर होती?
आज के ज़माने में
हँसी इतनी सस्ती नहीं है ना?

मेरी आज़ादी Kavita165

मेरी आज़ादी

बिना किसी उम्मीद के मैंने
जी लिया था पूरा एक संसार
क्यों होते हैं हम गलतफहमियों के शिकार?

तुम्हारे पास सपने ही सपने थे
किसी सपने की मुझसे नहीं थी पहचान
बार-बार मुझ तक क्यों आ रहे थे नादान?

सूरजमुखी दिन भर खिलते थे
रातरानी रात भर महकती थी
हम-तुम सिर्फ सूखते और झरते थे.

तुम्हें बहुत अहंकार था अपने होने का
तुम्हारा होना, न होना बराबर था
मेरे पास से जो गुज़रा, खारा सागर था.

रहो तुम अपने कैदखाने में बंद
मेरी आज़ादी मुझे मुबारक है
मेरा होना है तुम्हारे न होने में.

Thursday, 22 August 2013

कोई सजा नहीं Kavita164

कोई सजा नहीं

हरेक का अपना-अपना आसमान है
हरेक के अपने-अपने चाँद-सितारे।
हरेक के अपने-अपने रंग हैं
हरेक के अपने-अपने ढंग.

न मैं तेरे आसमान में उड़ने आऊँ
न तू मेरे चाँद-सितारे तोड़
न तू अपने रंग में मुझे मिला
न मैं तुझे अपने ढंग सिखाऊँ।

तूने पेड़ लगाए थे मेरे लिए
कि पेड़ घने हो कर मुझे छाया दें
मैंने फूल उगाए थे तेरे लिए
कि फूल खिल कर तुझे खुशबू दें.

सोचने को सोचा था हमने यह
कहने को कहा था बहुत कुछ
खाने को खाई थीं कसमें
निभाने को निभाई थीं रस्में।

जो हुआ सो हुआ, सब बीत गया
न तू शर्मिन्दा, न मैं शर्मिन्दा
छोड़ना कोई जुर्म नहीं है
हो भी तो इसकी कोई सजा नहीं है.

सजा हम खुद को देंगे खुद
तू वहाँ तड़प, मैं यहाँ तड़पूं
तू मुझे बद्दुआ दे, मैं तुझे बद्दुआ दूँ
तू मेरी चिट्ठियाँ जला, मैं तेरी जलाऊँ।

Tuesday, 20 August 2013

दुआओं का असर Kavita163

दुआओं का असर

उसने मेरे लिए भगवान से दुआ मांगी
कि मेरा हर सपना पूरा हो.

फिर अचानक डर गया.

उसे पता था
मेरे हर सपने में वह है
मेरा हर सपना उस पर ही ख़त्म होता है
उस पर ही पूरा होता है.

शायद उसने मन में
अपनी दुआ बदल दी
वरना वह मुझे मिल न जाता?

मैंने उसके लिए भगवान से दुआ मांगी
कि उसकी हर मुराद पूरी हो.

सच्चे दिल से दुआ मांगो
तो ज़रूर कबूल होती है.

भगवान ने मेरी दुआ कबूल की.

और वह चला गया मुझसे बहुत दूर
जैसे वही थी उसकी सबसे बड़ी मुराद.

मेरी ही दुआ मेरे खिलाफ हो गई.

अब मैं किसी के लिए दुआ नहीं मांगूंगी
दुआएं कबूल होती हैं.

Sunday, 18 August 2013

मेरी जिद Kavita162

मेरी जिद

आज मैंने फिर एक गज़ब कर दिया
कि उसे फिर से प्रेम-पत्र लिख दिया.
कहने को बातें हज़ारों थीं
पर एक ही शब्द लिख कर मैंने तौबा की.
वह मेरे शब्दों से डरता है
उसे नहीं समझ में आती मेरी बातें.

जब मैं कहूं, मौसम बहुत अच्छा है
वह आकाश की ओर देखने लगता है
मैं तारों की बात करूँ
तो उसे दिन में तारे नज़र आएं
फूलों की बात वह क्या समझेगा
बंजर में रह रहा है
पता नहीं, कब बरसेगा
सूख रहा है किसी मुहूर्त की प्रतीक्षा में.

उसे नहीं पता कोई रस्मो-रिवाज़
रिश्तों को कैसे निभाया जाए
नहीं जानता वह
होशो-हवास में दिखता है
पर पगलाया रहता है
अपनी ज़मीन खुद तोड़ने में मगन है.

ऐसा है वह, तो ऐसा क्यों है?
जैसा भी है वह, वैसा क्यों है?

कुछ ऐसा करूँ
कि वह जो मुरझाया है अनचाहे पतझर में
उसे महकाने के लिए
बसंत को लेकर आऊँ
ऊपरी हँसी जो हँसता है वह
उसे दिल से खिलखिलाना सिखाऊँ
जीना भूल गया है वह
उसे जीने की कला बताऊँ.

क्या तो करूँ मैं?
और क्या न करूँ?

प्यार वह मुझे करे, न करे
खुद से तो करे.

मुझे भी जिद
कि वह जो मर गया है मौत से पहले
उसे जिन्दा कर के रहूँगी
टूटी मूरत को फिर से गढ़ूँगी.
लडूँगी उसकी हर लापरवाही से
सहूँगी उसकी हर नादानी को
वह बौराया अपनेआप में नहीं है
उसे लिखूँगी मैं, उसकी पुनर्रचना करूँगी.

Friday, 16 August 2013

यह होना भी कैसा होना Kavita161

यह होना भी कैसा होना

पेड़ के पीले सूखे पत्ते सा झरा
आस का बुझता हुआ दीया
बारिश की बूँद सा टप-टप गिरा
विश्वास का टूटा हुआ पल
इंसान जन्म लेते हैं मरने के लिए
पर अहसास क्यों मर जाते हैं?
आस्था और लगाव के अडिग भाव
खंडहरों में बदल गए हैं
कल तक इरादों में जो बुलंदियां थीं
वे ज़मीन में धूल बन कर पड़ी हैं
लपटें जो उठ रही थीं लहक-लहक
उनकी राख हवाओं में उड़ रही है
बातों में रस की कोई कमी नहीं
पर छल-छद्म छुप नहीं रहा है
हंसी और ठहाकों के पीछे
एक मौत जैसी चुप्पी है
क्या समय लौट नहीं सकता पीछे?
हम हैं तो साथ-साथ ही
पर यह होना भी कैसा होना
जब भीतर कुछ बचा ही न हो.

Monday, 12 August 2013

छोटी कविता : 12

छोटी कविता : 12

अब मुझे तुम्हारा इंतज़ार नहीं
अब मैं तुमसे मिलने को बेताब नहीं
अब मुझे तुम्हारी ज़रूरत नहीं
अब मुझे कोई मोहमाया नहीं
अब तुम आओ या ना आओ
आओ भी तो मुझसे मिलो या न मिलो
मुझे फर्क नहीं पड़ता।
तुम इसी दुनिया में हो
मेरे लिए इतना काफी है

मैं पागल हो गई Kavita 160

मैं पागल हो गई

मैं पागल हो गई
वह आश्चर्यचकित रह गया
उसने कभी कोई पागल नहीं देखा था
यह उसके जीवन का नया अनुभव था.
पागल मैं हुई
दहशत उसकी आँखों में थी
शायद वह डर रहा था
कहीं मैं पागलपन में
उसका नाम न ले लूं.
अब तो उसे और भी ज्यादा छुपना है
पहले वह फिर थोड़ा भरोसा कर सकता था
अब एक पागल पर कैसा भरोसा?
उसके हिसाब से
उसकी ज़िन्दगी अब शुरू हुई है
उसे सावधानी बरतनी है.
वह हैरान है इस बात से भी
कि मैं पागलपन में खामोश हो गई हूँ
किसी को पत्थर नहीं मार रही
वह डरा हुआ है मेरी खामोशी से.
जो कभी खामोश नहीं रहते
उनकी खामोशी डराती है
पत्थर मारने वाले का हाथ पकड़ लो
खामोशी के भीतर कैसे घुसो?
वह संभ्रमित है
क्या मैं सचमुच पागल हो गई हूँ?
या सिर्फ खामोश हूँ?
उसे लगता है
बहुत बोलने वाले जब खामोश होते हैं
तो पागल ही होते हैं.
मुझे खुद नहीं पता
क्या मैं सचमुच पागल हो गई हूँ?
वरना मैं खामोश क्यों होती?

Sunday, 11 August 2013

कोई भी विकल्प नहीं Kavita 159

कोई भी विकल्प नहीं

हम ऐसे कब और क्यों हो गए?
पहले किताब की बात की
फिर मौसम का हाल पूछा
फिर भागदौड़ भरे शहर की चर्चा की
एक-दूसरे को देख लिया
मिलन की रीत पूरी हुई
तुम भी खुश, मैं भी खुश.

तुम्हारे सम्बोधन
ऐसे औपचारिक तो न थे
बात करते समय तुम्हारे माथे पर
लकीरें तो न होती थीं
तुम किताबें हाथ में लेकर
कभी मिलने तो न आते थे
निभाई तुमने रस्म, किस्सा हुआ ख़त्म।

मेरा कसूर जो मेरी बातों में वज़न
तुम्हारा सौभाग्य कि तुम हवा-से हल्के
मेरी गलती जो मैं रूह और आत्मा की बात करूँ
तुम्हारी समझ कि जो दिखता नहीं, वह होता नहीं
मैं बावरी जो तुम पर लुटने को तैयार
तुम चौकन्ने सँभल-सँभल कर करते वार
तुम देने में असमर्थ, मेरी सारी कोशिशें गई व्यर्थ।

तुम्हारे साथ ऐसे ही जीना हो तो जीऊँ मैं
न जीना चाहूँ तो तुम्हें क्या परवाह
तुमने अपने साथ जीने दिया, यही क्या कम
इतनी अकृतज्ञ नहीं कि तुम्हें दुआ न दूँ
चुनाव की सुविधा मेरे पास है
लेकिन मेरी ख़ुशी का कोई भी विकल्प नहीं
चुनना चाहूँ तो तुम्हें चुनूँ, वरना अपनी मौत चुनूँ।

Wednesday, 7 August 2013

सखी-संवाद

सखी-संवाद
(क्या सखी, साजन? न सखी, हम-तुम)

कल पूरा दिन बहुत उल्लास और थकावट भरा था. गगन गिल के साथ स्पाइस मॉल, नॉएडा में पहले उसकी शौपिंग हुई, फिर …. 

गगन : चलो कहीं ऐसी जगह बैठा जाए जहाँ शोर न हो.

मैं : फ़ूड कोर्ट इस समय खाली होता है,

पर नहीं, वहां भीड़ थी और शोरशराबा भी.

मैं : कौस्टा कॉफी में बैठते हैं.

गगन : पर यहाँ खाने को कुछ नमकीन तो है ही नहीं। मुझे भूख लगी है.

मैं : चल, फिर पिजा हट में बैठते हैं.

पिजा हट खाली पड़ा है, कभी यह सीट, कभी वह सीट.

मैं : यहाँ इतनी गर्मी क्यों है?

गगन : उठो, हल्दीराम में बैठेंगे।

मैं : आखिर आ गए न अपनी औकात पर?

मैं गगन को बताती हूँ कि उसका वह लेख, जो उसने मुझे मेल किया था और जो उसने अगले एक सेमीनार में पढना है. बहुत बढ़िया है.

मैं : गगन, मेरे लिए तुम्हारा यह रूप नया है कि तुमने बौद्ध धर्म ग्रहण किया हुआ है. आखिरी पोर्शन भी बढ़िया है, अनौपचारिक…. बीच में उद्धृत किसी के कविता-अंश बहुत ही प्रभावशाली हैं, 'क्या करना दुःख उसके लिए जिसका कोई उपाय नहीं, क्या करना दुःख उसके लिए जिसका कोई उपाय है.' बहुत खूब. 'यह उतना ही खाली है, जितना जीवन।' यह भाव मैं अपनी कविता में इस्तेमाल करूंगी, अपनी तरह से क्योंकि जीवन के खालीपन का अहसास मुझे बेहद हो रहा है.

गगन : मणिका, तुम हमेशा गलत दरवाज़ा क्यों खटखटाती हो?

मैं : आर यू श्योर गगन कि तुमने सही दरवाज़ा खटखटाया था?

गगन : वेरी श्योर, और मैं आजतक उसी दरवाज़े के भीतर हूँ.

मैं : लेकिन तुम्हारा यह एक अन्य लेख,  'दीक्षा पर्व' ….  मन की गहराई में दबा दर्द जैसे छन कर आया है. बहुत गहन भावाभिव्यक्ति है. दर्द बड़ी सूक्ष्मता से संवेदित हुआ है.

गगन : मणिका, तुमने खुद कहा था कि प्यार का दर्द भी प्यार ही होता है, प्यार का विरह भी प्यार ही होता है, प्यार में लड़ाई-झगड़ा भी प्यार ही होता है….

मैं : हाँ, किसी ने किसी से कहा था, उसने मुझसे कहा, मैंने तुमसे कहा…

बातों-बातों में मटर कुलचा और भल्ला पापड़ी चाट खा लिए गए थे.

गगन : अब और क्या खाना है? रसमलाई?

मैं : नहीं, कुल्फी फलूदा।

गगन : गुड आइडिया। तू बैठ, मैं लेकर आती हूँ. 

हल्दीराम में यही दुःख है, खुद पर्ची कटाओ, खुद खाना उठा कर लाओ. खाना बढ़िया है, पर बैठ कर खाने का सुख नहीं है.

मैं : यार गगन, अब तक तो हमारी हैसियत इतनी हो जानी चाहिए कि हमें खुद न सर्व करना पड़े.

गगन : राइट यू आर. देअर इज ऑलवेज़ अ नेक्स्ट टाइम।

मैं : यहाँ ऊपर एक नया रेस्तराँ खुला है, केवल लंच एंड डिनर होता है, बुफे विद अनलिमिटेड स्नैक्स, लगभग 1000 रु. पर-हेड. एक दिन वहां लंच करेंगे, मेरी तरफ से ट्रीट। एटलीस्ट, दिस मच आई कैन अफ़्फोर्ड।

गगन : डन. अब बता, तेरी कहानी का क्या हुआ?

मैं : बीच में अटकी पड़ी है. स्टैगनेंट पौइंट आ गया.

गगन : तो?

मैं : तो कुछ नहीं, सितारों से आगे जहाँ और भी हैं, अभी इश्क के इम्तेहाँ और भी हैं….

गगन : किसी ने अपनी सच्ची आत्मकथा लिखी होगी क्या? क्या कोई लिख सकता है?

मैं : मैं तो नहीं। शायद तू भी नहीं।

गगन : मेरी तेरी बात नहीं ….

मैं : पर गगन, मात्र घटनाओं का, तथ्यों का बयान ही तो आत्मकथा नहीं होता। उन तथ्यों के पीछे से जो सत्य उभर कर सामने आता है, यानि जीवन में हम जो अनुभव करते हैं, उन अनुभवों का निचोड़ …. 

गगन : तेरा मतलब है, आत्मकथा में पूरी कहानी सुनाने की ज़रुरत नहीं है?

मैं : नहीं, ओनली मॉरल ऑफ  स्टोरी इज सफ़िशिएन्ट।

गगन : क्या बात है? चल अब घूमते हुए बात करते हैं. बैठे-बैठे थक गए.… मणिका, तू यह फेसबुक छोड़ दे. इसमें वक्त की बर्बादी के सिवा कुछ नहीं।

मैं : बाहर देख, कितनी तेज़ बारिश हो रही है. तुझे दूर जाना है.

और हम अपनी-अपनी गाड़ियों की ओर बढ़ गए.

Tuesday, 6 August 2013

छोटी कविता : 11

छोटी कविता : 11

दुःख जीवन का एक मूल्य है
दुःख ने तराशा है मुझे
दुःख ने मुझे ऊंचाई दी
दुःख ने मुझे सब से जोड़ा
दुःख ने प्रेम में मरना सिखाया
दुःख ने हँस-हँस के जीना सिखाया
दुःख को चुन-चुन कर अपने ह्रदय में बसाया है मैंने।

छोटी कविता : 10

छोटी कविता : 10

चलो चलें
अपने मन के अंधेरों में
बाहर से ज्यादा उजाले हैं वहां
यादों की जलती हुई लपटें हैं
सपनों की अधबुझी चिंगारियां हैं
प्रेम-शव का दाह-अंगार है
रोशनी के लिए इतना काफी है.

छोटी कविता : 9

छोटी कविता : 9

खाली दिन, खाली सारे पल
जैसे खाली यह जीवन।
कुछ काम करें
खाली दिन को भरें।
खाली जीवन को भरने
क्या भीड़ में जाएं?
और भी खाली होकर वापस आएं?

Thursday, 1 August 2013

मरता छोड़ गया Kavita 158

मरता छोड़ गया

मेरे सपने में आ कर कल
कि वह कुछ ऐसा बोल गया
कि मेरी हँसी नहीं रूकती
कि मैं हूँ ढूंढ रही उसको
कि अब वह नज़र नहीं आए
कि अब मेरी दुनिया से दूर
मुझे वह रोता छोड़ गया.

चलूँ, सो जाऊँ मैं फिर से
कि वह सपने में फिर आए
कि फिर कुछ कहे हँसाने को
कि बातें बहुत थीं उसके पास
कि उसकी चंचलता अद्भुद
कि जागी मेरी बेहोशी
वह फिर से सोता छोड़ गया.

निशाचर भावों की बारात
कि मेरी दुनिया आभासी
कि मेरे सम्मुख वह दिन-रात
कि मेरी आँखों में छल-छल
कि मैं हूँ टूट रही पल-पल
कि मेरी कला-कल्पना को
वह यूं ही बहता छोड़ गया.

चिरन्तन प्रश्न निरुत्तर है
कि उसके ह्रदय नहीं था क्या
कि उसके भावों में गड़बड़
कि उसने प्यार किया कैसे
कि जब वह प्यार के नाकाबिल
कि मेरी शब्द-साधना को
निरंतर सहता छोड़ गया.

नहीं सुलझेगी यह गुत्थी
कि कितने तर्क बैठा लूँ मैं
कि कितने गणित लगा लूँ मैं
कि मेरे पूर्व जन्म का वह
कि उसका था बस इतना देय
कि मुझ को ज़िन्दा करके वह 
दोबारा मरता छोड़ गया.