Sunday, 18 August 2013

मेरी जिद Kavita162

मेरी जिद

आज मैंने फिर एक गज़ब कर दिया
कि उसे फिर से प्रेम-पत्र लिख दिया.
कहने को बातें हज़ारों थीं
पर एक ही शब्द लिख कर मैंने तौबा की.
वह मेरे शब्दों से डरता है
उसे नहीं समझ में आती मेरी बातें.

जब मैं कहूं, मौसम बहुत अच्छा है
वह आकाश की ओर देखने लगता है
मैं तारों की बात करूँ
तो उसे दिन में तारे नज़र आएं
फूलों की बात वह क्या समझेगा
बंजर में रह रहा है
पता नहीं, कब बरसेगा
सूख रहा है किसी मुहूर्त की प्रतीक्षा में.

उसे नहीं पता कोई रस्मो-रिवाज़
रिश्तों को कैसे निभाया जाए
नहीं जानता वह
होशो-हवास में दिखता है
पर पगलाया रहता है
अपनी ज़मीन खुद तोड़ने में मगन है.

ऐसा है वह, तो ऐसा क्यों है?
जैसा भी है वह, वैसा क्यों है?

कुछ ऐसा करूँ
कि वह जो मुरझाया है अनचाहे पतझर में
उसे महकाने के लिए
बसंत को लेकर आऊँ
ऊपरी हँसी जो हँसता है वह
उसे दिल से खिलखिलाना सिखाऊँ
जीना भूल गया है वह
उसे जीने की कला बताऊँ.

क्या तो करूँ मैं?
और क्या न करूँ?

प्यार वह मुझे करे, न करे
खुद से तो करे.

मुझे भी जिद
कि वह जो मर गया है मौत से पहले
उसे जिन्दा कर के रहूँगी
टूटी मूरत को फिर से गढ़ूँगी.
लडूँगी उसकी हर लापरवाही से
सहूँगी उसकी हर नादानी को
वह बौराया अपनेआप में नहीं है
उसे लिखूँगी मैं, उसकी पुनर्रचना करूँगी.

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