Thursday, 22 August 2013

कोई सजा नहीं Kavita164

कोई सजा नहीं

हरेक का अपना-अपना आसमान है
हरेक के अपने-अपने चाँद-सितारे।
हरेक के अपने-अपने रंग हैं
हरेक के अपने-अपने ढंग.

न मैं तेरे आसमान में उड़ने आऊँ
न तू मेरे चाँद-सितारे तोड़
न तू अपने रंग में मुझे मिला
न मैं तुझे अपने ढंग सिखाऊँ।

तूने पेड़ लगाए थे मेरे लिए
कि पेड़ घने हो कर मुझे छाया दें
मैंने फूल उगाए थे तेरे लिए
कि फूल खिल कर तुझे खुशबू दें.

सोचने को सोचा था हमने यह
कहने को कहा था बहुत कुछ
खाने को खाई थीं कसमें
निभाने को निभाई थीं रस्में।

जो हुआ सो हुआ, सब बीत गया
न तू शर्मिन्दा, न मैं शर्मिन्दा
छोड़ना कोई जुर्म नहीं है
हो भी तो इसकी कोई सजा नहीं है.

सजा हम खुद को देंगे खुद
तू वहाँ तड़प, मैं यहाँ तड़पूं
तू मुझे बद्दुआ दे, मैं तुझे बद्दुआ दूँ
तू मेरी चिट्ठियाँ जला, मैं तेरी जलाऊँ।

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