Sunday, 25 August 2013

मैं कहीं खो गई हूँ Kavita166

मैं कहीं खो गई हूँ

मैं कहीं खो गई हूँ
मुझे नहीं पता
मैं कहाँ खो गई हूँ.

पहले जैसा यहाँ कुछ नहीं है.
पहले मेरे साथ थी मेरी प्यारी अम्मा
अम्मा यानि दादी, मेरी सबसे अपनी.

दादी के ज़माने में
कटोरदान में भरी रहती थी रोटियाँ
अचार के मर्तबान
मिर्च-मसाले वाली सब्जियां
सब्जी न हो तो अचार से खालो
रोटियों की कोई कमी नहीं.

दादी कहा करती थी,
जो ताकत अन्न में है, किसी में नहीं.

मेरा मन कभी ललकता
बाहर की रंगीनियाँ देख कर
दादी समझाती,
देख पराई चूपड़ी क्यों ललचाए जी
रूखी-सूखी खाय के ठंडा पानी पी. 

दादी कहावतों में बात करती थी.
खाने से पहले रोटी का एक टुकड़ा
ज़रूर निकालती थी
न जाने किस के लिए
कभी कुत्ते के लिए, कभी गाय के लिए.
खाती जाती और कहती जाती
भागवान की कमाई में सबका साझा,
जहाँ नीयत, वहाँ बरकत.

बरकतों में पलती हुई मैं
फटे कपड़ों में जब
शीशे के आगे खड़ी होती
मेरे रूप में निखार आ जाता
दादी मेरी बलैयां लेती
मैं किसी राजकुमार के सपनों में खो जाती.

मैं और दादी दो नहीं थे, एक थे
और अकेले काफी थे हँसने के लिए
जीने के लिए.

कभी जो रोने दिया हो मुझे?
कभी जो निकले हों मेरी आँख से आंसू?

दादी गरीब थी इसलिए मैं भी गरीब थी
दादी अमीर होती तो मैं भी अमीर होती.
हम अपनी फकीरी में भी बादशाह हैं-
चढ़ती उम्र का जूनून मुझसे कहलवाता
दादी कहती, बोलना आ गया है तुझे.

फिर मैं पढ़ने लगी, लिखने भी लगी
यानि लिखने-पढ़ने लगी
और खो गई न जाने कौन सी दुनिया में?

अब दादी नहीं है
सिर्फ मैं हूँ और मेरे मन के अँधेरे हैं.
कौन सा देश है यह? कौन सा काल है यह?
पता नहीं।

नहीं हैं अब वह अभावों की महक
मेरे आसपास ऐश्वर्यशाली बंजर है
स्मृतियों की रौनकें हैं
और है एक फ़ालतू सा ख्याल-
यदि मैं भी दादी की तरह गरीब होती
तब भी क्या हँसी मेरे होठों पर होती?
आज के ज़माने में
हँसी इतनी सस्ती नहीं है ना?

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