Thursday, 1 August 2013

मरता छोड़ गया Kavita 158

मरता छोड़ गया

मेरे सपने में आ कर कल
कि वह कुछ ऐसा बोल गया
कि मेरी हँसी नहीं रूकती
कि मैं हूँ ढूंढ रही उसको
कि अब वह नज़र नहीं आए
कि अब मेरी दुनिया से दूर
मुझे वह रोता छोड़ गया.

चलूँ, सो जाऊँ मैं फिर से
कि वह सपने में फिर आए
कि फिर कुछ कहे हँसाने को
कि बातें बहुत थीं उसके पास
कि उसकी चंचलता अद्भुद
कि जागी मेरी बेहोशी
वह फिर से सोता छोड़ गया.

निशाचर भावों की बारात
कि मेरी दुनिया आभासी
कि मेरे सम्मुख वह दिन-रात
कि मेरी आँखों में छल-छल
कि मैं हूँ टूट रही पल-पल
कि मेरी कला-कल्पना को
वह यूं ही बहता छोड़ गया.

चिरन्तन प्रश्न निरुत्तर है
कि उसके ह्रदय नहीं था क्या
कि उसके भावों में गड़बड़
कि उसने प्यार किया कैसे
कि जब वह प्यार के नाकाबिल
कि मेरी शब्द-साधना को
निरंतर सहता छोड़ गया.

नहीं सुलझेगी यह गुत्थी
कि कितने तर्क बैठा लूँ मैं
कि कितने गणित लगा लूँ मैं
कि मेरे पूर्व जन्म का वह
कि उसका था बस इतना देय
कि मुझ को ज़िन्दा करके वह 
दोबारा मरता छोड़ गया.

4 comments:

  1. कि मेरे पूर्व जन्म का वह
    कि उसका था बस इतना देय
    कि मुझ को ज़िन्दा करके वह
    दोबारा मरता छोड़ गया.--दर्द -ए- दिल के भाव को बया करती सुन्दर अभिव्यक्ति
    latest post,नेताजी कहीन है।
    latest postअनुभूति : वर्षा ऋतु

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  2. कल 04/08/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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