Sunday, 11 August 2013

कोई भी विकल्प नहीं Kavita 159

कोई भी विकल्प नहीं

हम ऐसे कब और क्यों हो गए?
पहले किताब की बात की
फिर मौसम का हाल पूछा
फिर भागदौड़ भरे शहर की चर्चा की
एक-दूसरे को देख लिया
मिलन की रीत पूरी हुई
तुम भी खुश, मैं भी खुश.

तुम्हारे सम्बोधन
ऐसे औपचारिक तो न थे
बात करते समय तुम्हारे माथे पर
लकीरें तो न होती थीं
तुम किताबें हाथ में लेकर
कभी मिलने तो न आते थे
निभाई तुमने रस्म, किस्सा हुआ ख़त्म।

मेरा कसूर जो मेरी बातों में वज़न
तुम्हारा सौभाग्य कि तुम हवा-से हल्के
मेरी गलती जो मैं रूह और आत्मा की बात करूँ
तुम्हारी समझ कि जो दिखता नहीं, वह होता नहीं
मैं बावरी जो तुम पर लुटने को तैयार
तुम चौकन्ने सँभल-सँभल कर करते वार
तुम देने में असमर्थ, मेरी सारी कोशिशें गई व्यर्थ।

तुम्हारे साथ ऐसे ही जीना हो तो जीऊँ मैं
न जीना चाहूँ तो तुम्हें क्या परवाह
तुमने अपने साथ जीने दिया, यही क्या कम
इतनी अकृतज्ञ नहीं कि तुम्हें दुआ न दूँ
चुनाव की सुविधा मेरे पास है
लेकिन मेरी ख़ुशी का कोई भी विकल्प नहीं
चुनना चाहूँ तो तुम्हें चुनूँ, वरना अपनी मौत चुनूँ।

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