Monday, 12 August 2013

मैं पागल हो गई Kavita 160

मैं पागल हो गई

मैं पागल हो गई
वह आश्चर्यचकित रह गया
उसने कभी कोई पागल नहीं देखा था
यह उसके जीवन का नया अनुभव था.
पागल मैं हुई
दहशत उसकी आँखों में थी
शायद वह डर रहा था
कहीं मैं पागलपन में
उसका नाम न ले लूं.
अब तो उसे और भी ज्यादा छुपना है
पहले वह फिर थोड़ा भरोसा कर सकता था
अब एक पागल पर कैसा भरोसा?
उसके हिसाब से
उसकी ज़िन्दगी अब शुरू हुई है
उसे सावधानी बरतनी है.
वह हैरान है इस बात से भी
कि मैं पागलपन में खामोश हो गई हूँ
किसी को पत्थर नहीं मार रही
वह डरा हुआ है मेरी खामोशी से.
जो कभी खामोश नहीं रहते
उनकी खामोशी डराती है
पत्थर मारने वाले का हाथ पकड़ लो
खामोशी के भीतर कैसे घुसो?
वह संभ्रमित है
क्या मैं सचमुच पागल हो गई हूँ?
या सिर्फ खामोश हूँ?
उसे लगता है
बहुत बोलने वाले जब खामोश होते हैं
तो पागल ही होते हैं.
मुझे खुद नहीं पता
क्या मैं सचमुच पागल हो गई हूँ?
वरना मैं खामोश क्यों होती?

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