Friday, 16 August 2013

यह होना भी कैसा होना Kavita161

यह होना भी कैसा होना

पेड़ के पीले सूखे पत्ते सा झरा
आस का बुझता हुआ दीया
बारिश की बूँद सा टप-टप गिरा
विश्वास का टूटा हुआ पल
इंसान जन्म लेते हैं मरने के लिए
पर अहसास क्यों मर जाते हैं?
आस्था और लगाव के अडिग भाव
खंडहरों में बदल गए हैं
कल तक इरादों में जो बुलंदियां थीं
वे ज़मीन में धूल बन कर पड़ी हैं
लपटें जो उठ रही थीं लहक-लहक
उनकी राख हवाओं में उड़ रही है
बातों में रस की कोई कमी नहीं
पर छल-छद्म छुप नहीं रहा है
हंसी और ठहाकों के पीछे
एक मौत जैसी चुप्पी है
क्या समय लौट नहीं सकता पीछे?
हम हैं तो साथ-साथ ही
पर यह होना भी कैसा होना
जब भीतर कुछ बचा ही न हो.

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