Sunday, 25 August 2013

मेरी आज़ादी Kavita165

मेरी आज़ादी

बिना किसी उम्मीद के मैंने
जी लिया था पूरा एक संसार
क्यों होते हैं हम गलतफहमियों के शिकार?

तुम्हारे पास सपने ही सपने थे
किसी सपने की मुझसे नहीं थी पहचान
बार-बार मुझ तक क्यों आ रहे थे नादान?

सूरजमुखी दिन भर खिलते थे
रातरानी रात भर महकती थी
हम-तुम सिर्फ सूखते और झरते थे.

तुम्हें बहुत अहंकार था अपने होने का
तुम्हारा होना, न होना बराबर था
मेरे पास से जो गुज़रा, खारा सागर था.

रहो तुम अपने कैदखाने में बंद
मेरी आज़ादी मुझे मुबारक है
मेरा होना है तुम्हारे न होने में.

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