Wednesday, 28 August 2013

गीता श्री की कहानी

गीता श्री की कहानी

गीता श्री की कहानी, 'कहाँ तक भागोगी' 'जनसत्ता' के 25 अगस्त के अंक में, पढ़ कर अभी तक उबरी नहीं हूँ. क्या कहती है यह कहानी और क्या कहना चाहती है? कहती है यह कि एक हिन्दू लड़की, अपने धर्म से जिसका मोहभंग हो गया है, मुस्लिम बन जाती है, अपना देश छोड़ कर एक मुस्लिम देश की शरण लेती है, दिन भर लड़कियों की हथेलियों पर मेहँदी लगा कर, मेहँदी के बीच में अल्लाह कानाम लिख कर, मुस्लिम धर्म के प्रचार में जुटी रहती है और रात को एक नाईट क्लब में नौकरी करती है. लेखिका को वह एक शिप क्रूज़ पर मिलती है और उसे भी मुस्लिम धर्म ग्रहण करने के लिए उकसाती है. लेखिका कहानी में मात्र दर्शक की भूमिका अदा करती है, ज्यादा से ज्यादा अपने द्वारा रची हुई इस पात्र पर हैरान होती है और उसे अपने देश वापस लौटाने के लिए लेखिका के पास एक ही तर्क है कि अब भारत में भी बियर (डांस) बार खुल रहे हैं, वह लौट सकती है, उसे यहाँ भी काम मिल सकता है, दिन में धर्म-प्रचार, रात को डांस-बार, यह दोहरी ज़िन्दगी का नाटक वह क्यों करे?

मुझे ऐसा लगता है कि लेखिका ने यह कहानी लिखी ज़रूर लेकिन लेखिका ने खुद इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि यह कहानी कहना क्या चाहती है? होता है, बहुत बार ऐसा होता है, लेखक तथ्यों को कहानी में पिरो कर कहानी के बीच से इस तरह गायब हो जाता है कि कहानी का मंतव्य भी पढने वाले खुद ही ढूंढते हैं. अब सुनिए, कहानी क्या कहना चाहती है.... 'मैं भी हिन्दू हूँ, गुजरती हिन्दू, इला बेन. कन्वरटेड मुस्लिम। हिन्दू धर्म से मेरा मोहभंग हो चुका है, वहां किस-किस को साधती? इतने देवी-देवता। इतने पंथ. यहाँ अल्लाह एक है. वहां सुकून नहीं है. आठ साल पहले दुबई आ गई थी. अब मैं फातिमा हूँ. फातिमा। मुझे वहां वापस कभी नहीं जाना। मेरी कहानी फिर कभी. हैरान मत हो. बिना बुर्के का जीवन देख चुकी हूँ. हो सके तो ढक लो. लुट जाओगी, सब की सब.'

इस बात को काटने के लिए लेखिका ने कोई तर्क नहीं दिया। तो क्या कहानी यह कहना चाहती है कि हिन्दू धर्म बकवास है क्योंकि इस धर्म में अनेक देवी-देवता इंसान को कन्फ्यूज़ कर देते हैं कि वह किसे साधे, किसे नहीं? क्या कहानी यह कहना चाहती है कि मुस्लिम संस्कृति अधिक ग्राह्य है? लड़कियों का जीवन बुर्के में लिपट कर अधिक महफूज़ है? क्या आज जो हमारे नेता कह रहे हैं कि लड़कियों द्वारा अपने शरीर को पूरी तरह न ढक पाने के कारण ही बलात्कार जैसी बुराइयां जन्म ले रही हैं, वही यह कहानी भी कह रही है? क्या अपने देश और भारतीय / हिन्दू संस्कृति से भाग कर मुस्लिम धर्म में संरक्षण लेना सराहनीय है? यदि कहानी यही सब कहना चाहती है (जो कि जाहिरा तौर पर ज़ाहिर है) तो क्या इस कहानी के खिलाफ कोई हिन्दू मोर्चा खड़ा हो सकता है जो यह ऐतराज़ उठा सके कि इसमें हिन्दू धर्म की तौहीन हुई है और मुस्लिम धर्म को एक अपवाद के रूप में स्वीकार किया गया है? क्या एक अदद लड़की के अपने धर्म एवं संस्कृति से मिले कटु अनुभवों के आधार पर एक अन्य धर्म को शरणागत धर्म दिखाना उचित है? जबकि लेखिका का यह मकसद कभी नहीं रहा होगा।

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