Wednesday, 7 August 2013

सखी-संवाद

सखी-संवाद
(क्या सखी, साजन? न सखी, हम-तुम)

कल पूरा दिन बहुत उल्लास और थकावट भरा था. गगन गिल के साथ स्पाइस मॉल, नॉएडा में पहले उसकी शौपिंग हुई, फिर …. 

गगन : चलो कहीं ऐसी जगह बैठा जाए जहाँ शोर न हो.

मैं : फ़ूड कोर्ट इस समय खाली होता है,

पर नहीं, वहां भीड़ थी और शोरशराबा भी.

मैं : कौस्टा कॉफी में बैठते हैं.

गगन : पर यहाँ खाने को कुछ नमकीन तो है ही नहीं। मुझे भूख लगी है.

मैं : चल, फिर पिजा हट में बैठते हैं.

पिजा हट खाली पड़ा है, कभी यह सीट, कभी वह सीट.

मैं : यहाँ इतनी गर्मी क्यों है?

गगन : उठो, हल्दीराम में बैठेंगे।

मैं : आखिर आ गए न अपनी औकात पर?

मैं गगन को बताती हूँ कि उसका वह लेख, जो उसने मुझे मेल किया था और जो उसने अगले एक सेमीनार में पढना है. बहुत बढ़िया है.

मैं : गगन, मेरे लिए तुम्हारा यह रूप नया है कि तुमने बौद्ध धर्म ग्रहण किया हुआ है. आखिरी पोर्शन भी बढ़िया है, अनौपचारिक…. बीच में उद्धृत किसी के कविता-अंश बहुत ही प्रभावशाली हैं, 'क्या करना दुःख उसके लिए जिसका कोई उपाय नहीं, क्या करना दुःख उसके लिए जिसका कोई उपाय है.' बहुत खूब. 'यह उतना ही खाली है, जितना जीवन।' यह भाव मैं अपनी कविता में इस्तेमाल करूंगी, अपनी तरह से क्योंकि जीवन के खालीपन का अहसास मुझे बेहद हो रहा है.

गगन : मणिका, तुम हमेशा गलत दरवाज़ा क्यों खटखटाती हो?

मैं : आर यू श्योर गगन कि तुमने सही दरवाज़ा खटखटाया था?

गगन : वेरी श्योर, और मैं आजतक उसी दरवाज़े के भीतर हूँ.

मैं : लेकिन तुम्हारा यह एक अन्य लेख,  'दीक्षा पर्व' ….  मन की गहराई में दबा दर्द जैसे छन कर आया है. बहुत गहन भावाभिव्यक्ति है. दर्द बड़ी सूक्ष्मता से संवेदित हुआ है.

गगन : मणिका, तुमने खुद कहा था कि प्यार का दर्द भी प्यार ही होता है, प्यार का विरह भी प्यार ही होता है, प्यार में लड़ाई-झगड़ा भी प्यार ही होता है….

मैं : हाँ, किसी ने किसी से कहा था, उसने मुझसे कहा, मैंने तुमसे कहा…

बातों-बातों में मटर कुलचा और भल्ला पापड़ी चाट खा लिए गए थे.

गगन : अब और क्या खाना है? रसमलाई?

मैं : नहीं, कुल्फी फलूदा।

गगन : गुड आइडिया। तू बैठ, मैं लेकर आती हूँ. 

हल्दीराम में यही दुःख है, खुद पर्ची कटाओ, खुद खाना उठा कर लाओ. खाना बढ़िया है, पर बैठ कर खाने का सुख नहीं है.

मैं : यार गगन, अब तक तो हमारी हैसियत इतनी हो जानी चाहिए कि हमें खुद न सर्व करना पड़े.

गगन : राइट यू आर. देअर इज ऑलवेज़ अ नेक्स्ट टाइम।

मैं : यहाँ ऊपर एक नया रेस्तराँ खुला है, केवल लंच एंड डिनर होता है, बुफे विद अनलिमिटेड स्नैक्स, लगभग 1000 रु. पर-हेड. एक दिन वहां लंच करेंगे, मेरी तरफ से ट्रीट। एटलीस्ट, दिस मच आई कैन अफ़्फोर्ड।

गगन : डन. अब बता, तेरी कहानी का क्या हुआ?

मैं : बीच में अटकी पड़ी है. स्टैगनेंट पौइंट आ गया.

गगन : तो?

मैं : तो कुछ नहीं, सितारों से आगे जहाँ और भी हैं, अभी इश्क के इम्तेहाँ और भी हैं….

गगन : किसी ने अपनी सच्ची आत्मकथा लिखी होगी क्या? क्या कोई लिख सकता है?

मैं : मैं तो नहीं। शायद तू भी नहीं।

गगन : मेरी तेरी बात नहीं ….

मैं : पर गगन, मात्र घटनाओं का, तथ्यों का बयान ही तो आत्मकथा नहीं होता। उन तथ्यों के पीछे से जो सत्य उभर कर सामने आता है, यानि जीवन में हम जो अनुभव करते हैं, उन अनुभवों का निचोड़ …. 

गगन : तेरा मतलब है, आत्मकथा में पूरी कहानी सुनाने की ज़रुरत नहीं है?

मैं : नहीं, ओनली मॉरल ऑफ  स्टोरी इज सफ़िशिएन्ट।

गगन : क्या बात है? चल अब घूमते हुए बात करते हैं. बैठे-बैठे थक गए.… मणिका, तू यह फेसबुक छोड़ दे. इसमें वक्त की बर्बादी के सिवा कुछ नहीं।

मैं : बाहर देख, कितनी तेज़ बारिश हो रही है. तुझे दूर जाना है.

और हम अपनी-अपनी गाड़ियों की ओर बढ़ गए.

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