Monday, 30 September 2013

मेरे शब्द Kavita 174

मेरे शब्द

वह मेरे बस में है
जो मैंने नहीं कहा.
जो मैंने कह दिया
वह मेरे बस में कहाँ रहा?
वह सब तो दूसरों के हवाले हो गया.
वे जैसे चाहें, उसे समझें।

मैं बस अपने अनकहे की दावेदार हूँ.
अनकहे वे सारे शब्द जो अभी मेरे भीतर हैं
जिन्हें अभी मैंने अपने से दूर नहीं किया है
जिन्हें अभी मैंने किसी से नहीं बाँटा है
वे मेरे अपने हैं.

जो शब्द मेरे होठों से
मेरी कलम से निःसृत हो कर
मेरे चाहे-अनचाहे बाहर निकल गए
उन पर अब मेरा क्या अधिकार?
तीर कमान से निकल गया
तो बस निकल गया.

वे शब्द
अब हवाओं में घुले या बारिश में भीगें,
धूप में तपें या बहसों में खपें,
चाँदनी में नहाएँ या कहर ढाएँ, 
मुझे क्या?
मैं दूर खड़ी परायों की तरह देख रही हूँ
अपने शब्दों की खाक होती नियति।

Saturday, 28 September 2013

उसने कहा था Kavita 173

उसने कहा था
('साहित्य अमृत' जनवरी, 2014 में प्रकाशित)

उसने कहा था
तुम्हारे भीतर एक आग है
जो खींचती है मुझे तुम्हारी ओर.
अपना ही चयन उसे चुनौती सा लगा
कि एक दिन यह आग
उसे जला कर राख कर देगी.

उसने कहा था
तुम्हारे चेहरे पर
एक अजब सी रोशनी है.
और बुझ गया वह,
रोशन चेहरे की ओर देखते हुए
अन्धकार में बदल गया.

उसने कहा था
तुम्हारी बातों में कुछ ख़ास है
बड़ी महकी-सी मिठास है.
अजीब बात थी
उसके स्वाद की पहचान बदलने लगी
वही मिठास उसे ज़हर लगने लगी.

उसने कहा था
तुम्हारी हँसी में
मन्दिरों की घंटियाँ खनकती हैं.
दिन ऐसे अतीत हुए
जो एक दिन मुस्कान भी
व्यंग्य का पर्याय बन गई.

उसने कहा था
तुम सँवारोगी मेरा जीवन
दिखाओगी मुझे सही राह.
दीवाना मुझे छोड़ कर
किताबों में जीवन जीने के
नुस्खे तलाशने लगा.

रिक्त शब्दों से अनर्थ फूट रहा है
अर्थ अब भी सहमे-सहमे
हवाओं में बजबजा रहे हैं
समय ठहर गया है वहीँ का वहीँ.
उसने जो भी कहा था
उसे खुद नहीं पता कि क्यों कहा था?

Monday, 23 September 2013

ख़त्म हुई कहानी Kavita 172

ख़त्म हुई कहानी
('साहित्य अमृत' जनवरी, 2014 में प्रकाशित)

तुमने उस पल तक इंतज़ार किया
जब तक मन के निर्गंध आँगन में
महकते हुए फूल मुरझा नहीं गए.
तुमने तब तक अंधड़ बरसाए
जब तक बंजर नहीं हो गई उर्वर धरा,
सूख नहीं गया बादलों की आँख का पानी.
ख़त्म नहीं हो गई एक खूबसूरत कहानी.

तुम खिलते हुए मौसम पर
अपशकुन की तरह छाए
कि सूरज डर कर छुपा रहा
चाँद-तारे भी बेबस अँधेरे में रोते रहे
प्रकृति उलटफेर में उलझ गई.
तुममें कितनी थी नादानी.
मीठी सी कोई नहीं छोड़ी निशानी.

तुमने खुद रोपे थे प्रेम के बीज
खुद बनाई थी संगीत की धुनें
खुद चुना था साफ़-सुथरा रास्ता.
तुम्हारे आत्मघाती हमले से
सब तहस-नहस हो गया.
रुक गई एकाएक बहती हुई रवानी.
विष सी उछली मुंहफट बयानी.

धर्मग्रंथों में कथाएँ हैं ऐसी
युद्ध जीतने के लिए भी होती है नीति
अश्वत्थामा हतो, नरो वा, कुंजरो वा.
युद्ध कौशल के ज्ञान के बिना
तुम जीतने के भ्रम में युद्धरत हुए.
यह ज़िन्दगी बड़ी है शातिरानी.
तुम्हारे बस की नहीं थी यह, अज्ञानी.

तुम अपने ही हाथों मर गए.
अब कौन संजीवनी ले कर आएगा तुम्हारे लिए?
तुम बार-बार यूँ ही मरते रहोगे
तो बार-बार कौन जिलाएगा तुम्हें?
रिश्तों की डोर टूट चुकी कब की.
भगवान को सूझी यह कैसी शैतानी?
मेरा तुम्हारा मिलना था बेमानी.

Sunday, 22 September 2013

शायक आलोक

शायक आलोक

शायक आलोक के बारे में कोई कुछ भी कहे, शायक की प्रतिभा पर सवाल नहीं उठाया जा सकता. वह प्रतिभाशाली हैं. आज 'जनसत्ता' में शायक आलोक की चार कवितायेँ छपी हैं. ये कवितायेँ बेहतरीन हैं, उनसे जो वह फेसबुक पर पोस्ट करते रहते हैं. इन कविताओं में गरीबी का बयान है और बहुत ही व्यंग्यात्मक तरीके से स्थितियों का मज़ाक उड़ाते हुए उसका उपचार भी .... 

"उपाय करना किसे कहते हैं
कि तुम्हारे छप्पर से बूँद-बूँद तुम्हारे बस्तर पर टपक रहा हो पानी
और तुम कटोरा लिए हाथ उसे जमा करो...... 
तुम्हारे पेट में भूख अपनी दस्तक दे और
तुम खेतों की ओर निकल पड़ो बिया रोंपने."

शायक का कहना है कि खामोशी की कोई जुबां नहीं होती. वे बोल कर अपनी आवाज़ उठाने की महत्ता पर बल देते हुए कहते हैं.... 

"तुम्हारा चुप रहना तुम्हें अन्दर से ऐसे खा सकता है
जैसे चुप पड़ी किताबों को खा जाती है दीमक..... 
तुम्हें बोलना चाहिए कि बची रहे तुम्हारी आवाज़."

राजनीति पर मंतव्य देने के लिए भी शायक उत्सुक हैं. जनता को उसके अधिकारों का भान कराते हुए वे लोकतंत्र की बात कहते हैं जो जनता द्वारा चुना जाकर भी असली लोकतंत्र नहीं होता, बल्कि मिलावट से भरपूर होता है ......

"तुम्हें मताधिकार का जश्न ही नहीं
लोकतंत्र का शोक मनाने का भी पूरा अधिकार मिलना चाहिए."

सोनिया गांधी पर बड़े छद्म रूप से लिखी हुई कविता सार्वकालिक है जो किसी भी युग की रणनीति पर चरितार्थ हो सकती है...... 

"मैं खुल कर कहूँ कि राजा नहीं परदे के पीछे की रानी करती है दिल्ली साम्राज्य पर शासन..... 
रानी मुझे हाथी के पैर तले कुचलवा तो नहीं देगी."

Friday, 20 September 2013

तलाश जारी रहने दो Kavita 171

तलाश जारी रहने दो

दर्द को
बाहर निकलने के लिए
रास्ता दो
मन के सारे दरवाज़े
खिड़कियाँ
खोल दो.
बंद न रह जाए
कहीं कोई छिद्र
रिस रही जो पीर भीतर
बाहर बहने दो.

बागीचों की सज्जा
ऐसे ही नहीं होती
पेड़-पौधों की
क़तर-ब्यौंत ज़रूरी है.
हवा में घुलने के लिए
खुशबु मचल रही है
काँटों से बचने का
रास्ता खोज रही है.
मस्त बयारों में
खुशबु को भटकने दो.

सूरजमुखी
शाम को मुरझा जाता है
रजनीगंधा महकती है
रात के बाद भी.
सोचो तो सोचते रहो
उलझो तो उलझते रहो
ढूँढो तो ढूँढते रहो
हर प्रश्न का उत्तर नहीं होता.
फिर भी प्रयास-दर-प्रयास
तलाश जारी रहने दो.

घृणित प्रेम का दंश kAVITA 170

घृणित प्रेम का दंश

घृणित प्रेम का दंश मधुर ही होता है
लेकिन दंश पर दंश देने की प्रथा को
नाइंसाफी कहते हैं, प्रिय
प्रेम का घृणित होना तो घृणित है ही.

'धन्यवाद' शब्द पर्याप्त नहीं कृतग्य होने के लिए
कृतग्य होना है तो वह करो
जिससे मैं तुम्हारी कृतग्य होऊँ।
यह एक शब्द में समाप्त होने वाली प्रक्रिया नहीं है।

हवाओं में तीर नहीं छोड़ा करते, तीरंदाज़
झूठ के पाँव नहीं होते, असत्यभाषी
कागज़ की किश्तियाँ कितनी देर चलेंगी, अनाड़ी?
सितारों को तोडना महज़ खेल है, शब्दों के ख़िलाड़ी।

अपने भीतर झाँको, और झाँको
वहाँ कुछ है या खोखली जगह है?
कुछ है तो उसे पढ़ो, पढ़े-लिखे हो तुम
खोखली है तो उसे भरो, कुछ काम करो.

अहंकारी, यदि मैं तुमसे यह कहूँ
कि जो जितना तुच्छ होता है
उसका नखरा उतना ही बड़ा होता है,
तो इसे गाली मत समझना, सुधर जाना।

मुझे गाली देनी नहीं आती
गालियों के नाम पर मेरे पास है
सिर्फ निकृष्ट और तुच्छ
ये भी कोई गाली हुई भला?

गाली देना तो कोई तुमसे सीखे
खामोश रह कर बौछार करते हो
कड़वी नज़र से देख, कर देते हो भस्म
निभाने की तुम्हारे पास एक भी नहीं रस्म।

मैं तुम्हें छोड़ रही हूँ तो छूट जाओ
लटके मत रहो त्रिशंकु की तरह
तुमने कहा था कि तुम्हें चलना आ गया है
तो अब चल कर दिखाओ मेरा हाथ छोड़ कर.

मौत का पर्याय Kavita 169

मौत का पर्याय

वह भागता फिर रहा है खुद से.

नदियों और समुद्रों के शहर खींचते हैं उसे
पर्वतों और रेगिस्तानों की असम्भवता को लाँघना चाहता है वह
गुफाओं की रहस्यमयता पुकारती है उसे.

आकाश की ओर देख कर वह खामोश बुदबुदाता है
मन्दिरों के आगे से गुज़रते हुए उसका सिर झुक जाता है.

सभी नदियाँ पवित्र होती हैं
सभी नदियों का जल मीठा होता है
सभी नदियों में डुबकी लगा कर पवित्र होते हैं वे
जिनके मन पर पछतावों के बोझ हैं.

सारे समुद्र अथाह जलराशि को समेटे
अपनी नमकीन तासीर से चमकाते हैं उन्हें 
जो अनुभवों की मार से गंदे हो चुके हैं.

पर्वतों में एक पर्वत कैलाश
शिव का आवास
शिव हरेंगे उसके दुःख
शिव करेंगे संहार उसके अवचेतन में बैठे डर का.

भाग कर छुप जाना चाहता है वह गुफाओं में
पर उसे नहीं पता, किस से भाग कर?
कोई तो उसके पीछे नहीं है
दाएं, बाएँ, आगे, पीछे, ऊपर, नीचे
कहीं कोई नहीं है.
फिर किस से भाग रहा है वह?

कुछ आवाजें उसका पीछा कर रही हैं
उसकी साँस घुट रही है
उसका गला सूख रहा है
कहीं यह मृत्यु का फ़रिश्ता तो नहीं?
हाँ, मृत्यु फ़रिश्ता है और जीवन का नाम शैतान.

उसने कुछ गलत नहीं किया
उसने कोई पाप नहीं किया
उसने बस ज़िन्दगी को जीया
और यह ज़िन्दगी को जीना ही
उसके लिए मौत का पर्याय बन गया.

उसे लगता है,
गुफाओं में छुप कर उसकी ग्रन्थियाँ टूटेंगी.
साधना और सन्यास
हरेंगे जीवन का संत्रास.


Wednesday, 18 September 2013

I speak the way I do

I speak the way I do

I am a liberated woman.
My views are liberal
I am single and don't want to mingle
I am alone but not lonely
I am working hard and hardly tired
I am enjoying freedom but am not undisciplined
I am frank but not outspoken
I move wherever I want
But out of the way is not my faunt.
That is why I speak the way I do.

I am a liberated woman
I am at a comfortable age to leave inhibitions
I don't hesitate to talk about love
Love is not a crime
Love is not a physical thing
Its from heart to heart, soul to soul
People starve for love and affection
I don't starve, but I long
For love is a beautiful song
That is why I speak the way I do.

I am a liberated woman
I move freely around
But I am not a vagabond
I do need many things
Like other people do
I am honest and pious
I have got my right of choice
I am not after worldly pleasure
I am true to my sensible liesure.
That is why I speak the way I do.

I am a liberated woman
I don't enjoy double morality
My life is an open book
People may not appreciate its bold look
I damn care others' opinion
I am capable to live the way I like
I can throw my voice without any mike
I am strong enough to accept rejection
I hold my tears in any dejection.
That is why I speak the way I do.

Friday, 6 September 2013

छोटी कविता : 17

छोटी कविता

तुम दौड़ सकते हो
सीधी-सपाट सड़क पर.
गतिरोधक हों तो
चलना भी दुश्वार तुम्हें।
यह मेरी शिकायत नहीं
सस्वर चिंतन है 
शायद तुम सीख लो
अपना ख्याल खुद रखना।

छोटी कविता : 16

छोटी कविता

मुरझाती हुई शाखों
और शाख से टूटे पत्तों को दोष मत दो.
वृक्ष की जड़ों में देखो
कितना विष भरा है तुमने।
तुम्हें पेड़-पौधों को सींचने की कला
सीखनी होगी।
फूलों के बिना जीना भी क्या जीना।

छोटी कविता : 15

छोटी कविता

मेरे आत्मसखा !
तुम्हारी यादों का खज़ाना
कभी अतीत नहीं बनेगा
यह भविष्य में भी
वर्तमान बन कर मेरे साथ चलेगा।
देखना चाहो तो तुम भी चलो साथ.

Thursday, 5 September 2013

छोटी कविता : 14

छोटी कविता : 14

वह मुझे भूल ही गया होगा शायद
इतने दिन से उसने
लड़ाई का कोई पैगाम नहीं भेजा.
अरे आजा, लड़ने के लिए ही आजा
भरोसा तो रहे कि तू मुझे भूला नहीं है.

Wednesday, 4 September 2013

छोटी कविता : 13

छोटी कविता : 13

तुम्हारे झूठे प्रेम-पत्रों ने
मुझे सच्चा योगी बना दिया।
तुम्हारे झूठे प्रेम-प्रहार ने
मुझे सच्चा सन्यासी बना दिया।
अब मुझमें दुनिया से
लड़ने और इसे जीतने की शक्ति है.
तुम धन्य हो मेरे झूठे प्रेमी।
तुमने मुझे कहाँ से कहाँ पहुंचा दिया।

Sunday, 1 September 2013

कुछ तो है Kavita168

कुछ तो है

कुछ तो है
कुछ तो है
जो मेरे तुम्हारे बीच में है.

जो मेरे तुम्हारे बीच में है
वह हमें अलग नहीं करता
बीच में हो कर भी
वह हमें जोड़ता है एक दूसरे से.

कुछ तो है
कुछ तो है
जो हमें खींचता है एक दूसरे की तरफ.

जो खींचता है हमें
अनदेखा तार जैसा
बार-बार दूर ले जाता है
बार-बार पास लाता है.

कुछ तो है
कुछ तो है
जो बाँधता है हमें।

बाँधता है रंग-बिरंगे धागों से
हँसी के रंग, आँसू के रंग
ख़ुशी के रंग, उदासी के रंग
कभी खिलते हुए, कभी बदरंग।

कुछ तो है
कुछ तो है
जो रोकता है हमें टूटने से.

टूटने नहीं देता
गहरा आघात भी 
एक कच्चा सा उम्मीद का दीया
जलता रहता है मन-अंधियार में.