Friday, 20 September 2013

मौत का पर्याय Kavita 169

मौत का पर्याय

वह भागता फिर रहा है खुद से.

नदियों और समुद्रों के शहर खींचते हैं उसे
पर्वतों और रेगिस्तानों की असम्भवता को लाँघना चाहता है वह
गुफाओं की रहस्यमयता पुकारती है उसे.

आकाश की ओर देख कर वह खामोश बुदबुदाता है
मन्दिरों के आगे से गुज़रते हुए उसका सिर झुक जाता है.

सभी नदियाँ पवित्र होती हैं
सभी नदियों का जल मीठा होता है
सभी नदियों में डुबकी लगा कर पवित्र होते हैं वे
जिनके मन पर पछतावों के बोझ हैं.

सारे समुद्र अथाह जलराशि को समेटे
अपनी नमकीन तासीर से चमकाते हैं उन्हें 
जो अनुभवों की मार से गंदे हो चुके हैं.

पर्वतों में एक पर्वत कैलाश
शिव का आवास
शिव हरेंगे उसके दुःख
शिव करेंगे संहार उसके अवचेतन में बैठे डर का.

भाग कर छुप जाना चाहता है वह गुफाओं में
पर उसे नहीं पता, किस से भाग कर?
कोई तो उसके पीछे नहीं है
दाएं, बाएँ, आगे, पीछे, ऊपर, नीचे
कहीं कोई नहीं है.
फिर किस से भाग रहा है वह?

कुछ आवाजें उसका पीछा कर रही हैं
उसकी साँस घुट रही है
उसका गला सूख रहा है
कहीं यह मृत्यु का फ़रिश्ता तो नहीं?
हाँ, मृत्यु फ़रिश्ता है और जीवन का नाम शैतान.

उसने कुछ गलत नहीं किया
उसने कोई पाप नहीं किया
उसने बस ज़िन्दगी को जीया
और यह ज़िन्दगी को जीना ही
उसके लिए मौत का पर्याय बन गया.

उसे लगता है,
गुफाओं में छुप कर उसकी ग्रन्थियाँ टूटेंगी.
साधना और सन्यास
हरेंगे जीवन का संत्रास.


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