Friday, 20 September 2013

घृणित प्रेम का दंश kAVITA 170

घृणित प्रेम का दंश

घृणित प्रेम का दंश मधुर ही होता है
लेकिन दंश पर दंश देने की प्रथा को
नाइंसाफी कहते हैं, प्रिय
प्रेम का घृणित होना तो घृणित है ही.

'धन्यवाद' शब्द पर्याप्त नहीं कृतग्य होने के लिए
कृतग्य होना है तो वह करो
जिससे मैं तुम्हारी कृतग्य होऊँ।
यह एक शब्द में समाप्त होने वाली प्रक्रिया नहीं है।

हवाओं में तीर नहीं छोड़ा करते, तीरंदाज़
झूठ के पाँव नहीं होते, असत्यभाषी
कागज़ की किश्तियाँ कितनी देर चलेंगी, अनाड़ी?
सितारों को तोडना महज़ खेल है, शब्दों के ख़िलाड़ी।

अपने भीतर झाँको, और झाँको
वहाँ कुछ है या खोखली जगह है?
कुछ है तो उसे पढ़ो, पढ़े-लिखे हो तुम
खोखली है तो उसे भरो, कुछ काम करो.

अहंकारी, यदि मैं तुमसे यह कहूँ
कि जो जितना तुच्छ होता है
उसका नखरा उतना ही बड़ा होता है,
तो इसे गाली मत समझना, सुधर जाना।

मुझे गाली देनी नहीं आती
गालियों के नाम पर मेरे पास है
सिर्फ निकृष्ट और तुच्छ
ये भी कोई गाली हुई भला?

गाली देना तो कोई तुमसे सीखे
खामोश रह कर बौछार करते हो
कड़वी नज़र से देख, कर देते हो भस्म
निभाने की तुम्हारे पास एक भी नहीं रस्म।

मैं तुम्हें छोड़ रही हूँ तो छूट जाओ
लटके मत रहो त्रिशंकु की तरह
तुमने कहा था कि तुम्हें चलना आ गया है
तो अब चल कर दिखाओ मेरा हाथ छोड़ कर.

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