Sunday, 22 September 2013

शायक आलोक

शायक आलोक

शायक आलोक के बारे में कोई कुछ भी कहे, शायक की प्रतिभा पर सवाल नहीं उठाया जा सकता. वह प्रतिभाशाली हैं. आज 'जनसत्ता' में शायक आलोक की चार कवितायेँ छपी हैं. ये कवितायेँ बेहतरीन हैं, उनसे जो वह फेसबुक पर पोस्ट करते रहते हैं. इन कविताओं में गरीबी का बयान है और बहुत ही व्यंग्यात्मक तरीके से स्थितियों का मज़ाक उड़ाते हुए उसका उपचार भी .... 

"उपाय करना किसे कहते हैं
कि तुम्हारे छप्पर से बूँद-बूँद तुम्हारे बस्तर पर टपक रहा हो पानी
और तुम कटोरा लिए हाथ उसे जमा करो...... 
तुम्हारे पेट में भूख अपनी दस्तक दे और
तुम खेतों की ओर निकल पड़ो बिया रोंपने."

शायक का कहना है कि खामोशी की कोई जुबां नहीं होती. वे बोल कर अपनी आवाज़ उठाने की महत्ता पर बल देते हुए कहते हैं.... 

"तुम्हारा चुप रहना तुम्हें अन्दर से ऐसे खा सकता है
जैसे चुप पड़ी किताबों को खा जाती है दीमक..... 
तुम्हें बोलना चाहिए कि बची रहे तुम्हारी आवाज़."

राजनीति पर मंतव्य देने के लिए भी शायक उत्सुक हैं. जनता को उसके अधिकारों का भान कराते हुए वे लोकतंत्र की बात कहते हैं जो जनता द्वारा चुना जाकर भी असली लोकतंत्र नहीं होता, बल्कि मिलावट से भरपूर होता है ......

"तुम्हें मताधिकार का जश्न ही नहीं
लोकतंत्र का शोक मनाने का भी पूरा अधिकार मिलना चाहिए."

सोनिया गांधी पर बड़े छद्म रूप से लिखी हुई कविता सार्वकालिक है जो किसी भी युग की रणनीति पर चरितार्थ हो सकती है...... 

"मैं खुल कर कहूँ कि राजा नहीं परदे के पीछे की रानी करती है दिल्ली साम्राज्य पर शासन..... 
रानी मुझे हाथी के पैर तले कुचलवा तो नहीं देगी."

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