Monday, 23 September 2013

ख़त्म हुई कहानी Kavita 172

ख़त्म हुई कहानी
('साहित्य अमृत' जनवरी, 2014 में प्रकाशित)

तुमने उस पल तक इंतज़ार किया
जब तक मन के निर्गंध आँगन में
महकते हुए फूल मुरझा नहीं गए.
तुमने तब तक अंधड़ बरसाए
जब तक बंजर नहीं हो गई उर्वर धरा,
सूख नहीं गया बादलों की आँख का पानी.
ख़त्म नहीं हो गई एक खूबसूरत कहानी.

तुम खिलते हुए मौसम पर
अपशकुन की तरह छाए
कि सूरज डर कर छुपा रहा
चाँद-तारे भी बेबस अँधेरे में रोते रहे
प्रकृति उलटफेर में उलझ गई.
तुममें कितनी थी नादानी.
मीठी सी कोई नहीं छोड़ी निशानी.

तुमने खुद रोपे थे प्रेम के बीज
खुद बनाई थी संगीत की धुनें
खुद चुना था साफ़-सुथरा रास्ता.
तुम्हारे आत्मघाती हमले से
सब तहस-नहस हो गया.
रुक गई एकाएक बहती हुई रवानी.
विष सी उछली मुंहफट बयानी.

धर्मग्रंथों में कथाएँ हैं ऐसी
युद्ध जीतने के लिए भी होती है नीति
अश्वत्थामा हतो, नरो वा, कुंजरो वा.
युद्ध कौशल के ज्ञान के बिना
तुम जीतने के भ्रम में युद्धरत हुए.
यह ज़िन्दगी बड़ी है शातिरानी.
तुम्हारे बस की नहीं थी यह, अज्ञानी.

तुम अपने ही हाथों मर गए.
अब कौन संजीवनी ले कर आएगा तुम्हारे लिए?
तुम बार-बार यूँ ही मरते रहोगे
तो बार-बार कौन जिलाएगा तुम्हें?
रिश्तों की डोर टूट चुकी कब की.
भगवान को सूझी यह कैसी शैतानी?
मेरा तुम्हारा मिलना था बेमानी.

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