Saturday, 28 September 2013

उसने कहा था Kavita 173

उसने कहा था
('साहित्य अमृत' जनवरी, 2014 में प्रकाशित)

उसने कहा था
तुम्हारे भीतर एक आग है
जो खींचती है मुझे तुम्हारी ओर.
अपना ही चयन उसे चुनौती सा लगा
कि एक दिन यह आग
उसे जला कर राख कर देगी.

उसने कहा था
तुम्हारे चेहरे पर
एक अजब सी रोशनी है.
और बुझ गया वह,
रोशन चेहरे की ओर देखते हुए
अन्धकार में बदल गया.

उसने कहा था
तुम्हारी बातों में कुछ ख़ास है
बड़ी महकी-सी मिठास है.
अजीब बात थी
उसके स्वाद की पहचान बदलने लगी
वही मिठास उसे ज़हर लगने लगी.

उसने कहा था
तुम्हारी हँसी में
मन्दिरों की घंटियाँ खनकती हैं.
दिन ऐसे अतीत हुए
जो एक दिन मुस्कान भी
व्यंग्य का पर्याय बन गई.

उसने कहा था
तुम सँवारोगी मेरा जीवन
दिखाओगी मुझे सही राह.
दीवाना मुझे छोड़ कर
किताबों में जीवन जीने के
नुस्खे तलाशने लगा.

रिक्त शब्दों से अनर्थ फूट रहा है
अर्थ अब भी सहमे-सहमे
हवाओं में बजबजा रहे हैं
समय ठहर गया है वहीँ का वहीँ.
उसने जो भी कहा था
उसे खुद नहीं पता कि क्यों कहा था?

2 comments:

  1. achchhe udgar hain. Prem ki trasad sthiti bhi bahut meethi lagti hai kyonki yeh sochne ko vivash karat a hai.

    ReplyDelete