Monday, 30 September 2013

मेरे शब्द Kavita 174

मेरे शब्द

वह मेरे बस में है
जो मैंने नहीं कहा.
जो मैंने कह दिया
वह मेरे बस में कहाँ रहा?
वह सब तो दूसरों के हवाले हो गया.
वे जैसे चाहें, उसे समझें।

मैं बस अपने अनकहे की दावेदार हूँ.
अनकहे वे सारे शब्द जो अभी मेरे भीतर हैं
जिन्हें अभी मैंने अपने से दूर नहीं किया है
जिन्हें अभी मैंने किसी से नहीं बाँटा है
वे मेरे अपने हैं.

जो शब्द मेरे होठों से
मेरी कलम से निःसृत हो कर
मेरे चाहे-अनचाहे बाहर निकल गए
उन पर अब मेरा क्या अधिकार?
तीर कमान से निकल गया
तो बस निकल गया.

वे शब्द
अब हवाओं में घुले या बारिश में भीगें,
धूप में तपें या बहसों में खपें,
चाँदनी में नहाएँ या कहर ढाएँ, 
मुझे क्या?
मैं दूर खड़ी परायों की तरह देख रही हूँ
अपने शब्दों की खाक होती नियति।

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