Thursday, 10 October 2013

स्त्री विमर्श 1

स्त्री विमर्श 1 : (प्रकाशित : बिंदिया, नवम्बर, '13)

मैत्रेयी पुष्पा के लेख के सन्दर्भ में

मैत्रेयी पुष्पा के लेख का शीर्षक सिर्फ 'स्त्री विमर्श' नहीं है, बल्कि 'स्त्री विमर्श और आत्मालोचन' है. उन्होंने स्त्री विमर्श की समर्थक लेखिकाओं को अपने भीतर झाँकने की सलाह दी है, लेकिन उन्होंने स्वयं अपने आत्म का कितना अवलोकन किया है, यह बात देखने योग्य है. वे लेख के पूर्वार्ध में संतुलित तरीके से बात कहती हैं लेकिन लेख के उत्तरार्ध में उनका संतुलन बिगड़ गया लगता है. उनका गुस्सा युवा लेखिकाओं पर क्यों निकला, इसकी वजह वही जानती हैं. वह तो उन्हें लेखिका तक कहने को तैयार नहीं। मैत्रेयी का यह कथन ….  "उन रचनाकारों को सचेत होना पड़ेगा जिनको हम लेखिका कहते हैं." आपत्तिजनक है. जो हैं ही लेखिका, उन्हें आप लेखिका कह कर अहसान नहीं कर रहे. इस कथन से यह ध्वनित होता है कि मैत्रेयी अपने अतिरिक्त अन्य किसी को लेखिका कहा जाना पसंद नहीं करतीं।

दूसरा आपत्तिजनक कथन है, "वे (युवा लेखिकाएं) लेखन के हल्केपन की परवाह नहीं करती, जवानी को संजोए रखने की फ़िक्र में हैं." और अपनी असली उम्र नहीं बतातीं। अरे मैत्रेयी जी, हमारी-आपकी जवानी जा रही है, तो इसका यह मतलब नहीं कि दूसरों की जवानी से जलें। यह विचारणीय प्रश्न है कि युवा लेखन कैसे निर्धारित हो? क्या लेखक की उम्र से या लेखन की उम्र से? जिन लेखक / लेखिकाओं ने चालीस वर्ष की उम्र के बाद लेखन की दुनिया में प्रवेश किया, वे अपनी किस उम्र तक या अपनी लिखी कितनी पुस्तकों तक युवा कहलाएंगे? स्त्री विमर्श की चर्चा करते समय लेखिकाओं को इन शब्दों में ललकारना निन्दास्पद है एवं विषयांतर भी.

मैत्रेयी का तीसरा प्रश्न जो स्त्री विमर्श से जुड़ा है वह है, "आज की रचनाओं में लिव इन रिलेशनशिप, अफेअर, मैरिज, डाइवोर्स, और कितने-कितने लोगों से यौन सुख का रिफ्रेशमेंट उफ़ ! यह स्त्री विमर्श? स्त्री का मनुष्य रूप केवल यही है? उसने अपने हक़-हकूक केवल इसी स्थिति के लिए लेने चाहे थे?" लेकिन बाद में उन्होंने मान भी लिया कि यह सही है, इस विषय पर रचनाएं आनी चाहिए।

विज्ञापनों में स्त्री देह को माध्यम बनाने का विरोध सही है लेकिन मैत्रेयी को विवाह के मौके पर स्त्री का साज-श्रृंगार करना भी नहीं सोहता। क्या विमर्श के नाम पर स्त्री अपनी इयत्ता को खो दे?

मैत्रेयी को क्यों है युवा लेखिकाओं पर इतना क्रोध? क्यों है युवा लेखिकाओं से इतनी ईर्ष्या? क्या इसलिए कि उन्हें अपना युवा वक़्त ख़त्म होता हुआ लग रहा है?

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