Thursday, 10 October 2013

स्त्री विमर्श 2

स्त्री विमर्श 2


मेरे तईं स्त्री विमर्श की सार्थकता तब है जब इसकी शुरुआत स्त्रियों द्वारा पुरुष की दी गई सुविधाओं को नकारने से हो. मैं स्त्रियों की आज़ादी के पूर्णतया पक्ष में हूँ. लेकिन कानून द्वारा स्त्रियों को जो सुविधाएं दी गई हैं, प्रायः उनका अनुचित लाभ उठाते स्त्रियों को देखा गया है. मेरी जानकारी में अनेक ऐसे किस्से हैं, जहाँ औरतों ने आउट ऑफ़ द वे जाकर अपने पक्ष में लड़ाई की और जीती है. लड़की की शादी के लिए लड़के के स्टेटस को मुख्यता दी जाती है, उनके आपसी व्यक्तित्व तथा मानसिकता के विरोधी स्वरुप की ओर ध्यान नहीं दिया जाता। लड़की वालों को पहले बता दिया जाता है कि फलां घर का रीति-रिवाज़ इस तरीके का है, लड़की एडजस्ट कर पाएगी या नहीं, देख लें लेकिन लड़की वालों का प्रयास ऐसा रहता है कि लड़के की आर्थिक स्थिति देख कर किसी तरह एक बार शादी के बंधन में उसे बाँध लिया जाए, किसी तरह एक बार उसके घर में घुस जाएं, बाद में तो हमारी पाँचों उंगलियाँ घी में हैं, ठीक से निभेगा तो ठीक, वरना उसका पैसा ऐंठ कर चलते बनेंगे। शादी के शुरू में भी लड़की को बता दिया जाता है कि देखो, इस घर का रीति-रिवाज़ यह है, चुनाव तुम्हारे हाथ में है, रहो या जाओ, लेकिन लड़की चूंकि लड़की है और अपने अधिकारों के प्रति सजग है, तो उसका रवैया यही रहता है कि बच्चू, देख, तुझे कैसा सबक सिखाती हूँ. लड़कियों को सास, ससुर, ननद, देवर वाले घर में जाना पसंद नहीं होता, लेकिन वे सोचती हैं कि इनसे तो बाद में निबट लेंगे। ऐसे विचारों की लडकियां जो खप जाती हैं, वे अपने विवाह को सफल कहती हैं. यह घर-घर की कहानी है कि लडकियां ज़बरदस्ती लड़कों और उनके परिवार पर थोपी जाती हैं. असल में इसका कारण यह है कि आज भी लड़कियों को अच्छे लड़के मुश्किल से मिलते हैं और लड़के के लिए एक वैवाहिक विज्ञापन देते ही लड़कियों के बायोडाटा के ढेर लग जाते हैं. लोग अपनी बेटियों के रिश्ते लेकर पीछे पड़े रहते हैं. मित्रों, मैं खुद एक स्त्री होने के नाते स्त्री-विरोधी कदापि नहीं हूँ, लेकिन स्त्रियों द्वारा अपने स्त्री होने का फायदा उठा कर अत्याचार किए जाने के पक्ष में भी नहीं हूँ. आजकल विवाह एक प्रेम का रिश्ता नहीं, व्यवसाय बन कर रह गया है. है कोई ऐसी स्त्री जिसने पुरुषों से बराबरी का रोना तो रोया हो लेकिन पुरुषों द्वारा प्रदत्त सुविधाओं पर आश्रित न रही हों?

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