Thursday, 10 October 2013

ग़ज़ल 31

ग़ज़ल 31

जो डूबे हुए थे अथाह गहरे सागर
कि उनकी भी आँखों में पानी नहीं है.

सुनाने लगेंगे तो रोके ना कोई
यह कोई ज़रा सी कहानी नहीं है.

तूने जो फेंका था स्वप्नजाल उसमें
बिना तेरे जीना आसानी नहीं है

तेरी बातें चंचल, तेरी चाह अद्भुद
कि मुझ सी कोई धुन दीवानी नहीं है.

मेरे पाँव डगमग, मेरी चाल लड़खड़
सफ़र में कोई भी सैलानी नहीं है.

कि कैसे वहाँ पहुँच पाएँगे कब तक
कोई राह जानी-पहचानी नहीं है.

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