Wednesday, 2 October 2013

मुठभेड़ - ध्रुव गुप्त

मुठभेड़ - ध्रुव गुप्त

मुठभेड़ - ध्रुव गुप्त का पहला कहानी संग्रह, जो राजकमल द्वारा सन 2004 में प्रकाशित हुआ था, मेरे सामने है. मुझे नहीं मालूम था, ध्रुव गुप्त कहानियाँ भी लिखते हैं. मैं उन्हें गज़लकार / कवि के रूप में जानती थी. लेकिन जब उनकी एक कहानी 'अपराधी' मैंने फेसबुक पर पढ़ी, तो उनके गद्य ने मुझे उनकी लिखी गजलों / कविताओं से ज्यादा प्रभावित किया और मेरा प्रयास रहा कि मैं उनकी लिखी अन्य कहानियाँ भी पढूँ। अब जब मैंने 'मुठभेड़' की कहानियाँ पढ़ीं तो मैं निश्चित रूप से कह सकती हूँ कि वे कवि से बढ़ कर कहानीकार हैं. यह बात दूसरी है कि उनकी कहानियों के भीतर से उनका कवि ह्रदय झाँकता है, उनकी कहानियों में उनका कवि ही मुखर है.

इस संग्रह में 12 कहानियाँ संकलित हैं, जो उनके पुलिस की नौकरी के अनुभवों से रँगी हुई हैं. कहानियाँ पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि हम पुलिस महकमे के भीतर खड़े हुए वहाँ की कार्यप्रणाली को देख रहे हैं. उन्होंने निःसंग भाव से पुलिस के अन्दरूनी राज़ कुछ इस तरह खोले हैं, जैसे पुलिस में नौकरी करने का उनका मकसद केवल कहानियों के लिए विषय जुटाना था, क्योंकि उनके द्वारा निर्मित कहानियों का नायक, जो एक पुलिस अधिकारी है और इस चरित्र में लेखक की अपनी प्रतिच्छवि है, वह अपने भावुक ह्रदय, दयाभाव, कल्पनाशीलता के कारण स्वयं को इस नौकरी के काबिल नहीं पाता. पाठक की दृष्टि में भी उसकी छवि एक ऐसे अधिकारी की हैं जो मानो किसी अवांछित नौकरी में फँसा हुआ है. ज़ाहिर है, उसका कोमल ह्रदय पुलिस की क्रूर एवं हृदयहीन कार्यशैली के साथ समझौता नहीं कर पाता। वह इस नौकरी के खुरदुरेपन से कोसों दूर है. कहानी 'थर्ड डिग्री' में थर्ड डिग्री का प्रयोग, कहानी 'मुठभेड़' में झूठी मुठभेड़ दिखा कर निर्दोष युवकों की हत्या करना, अपने काम को जस्टिफाई करने की पैंतरेबाजी, गलत को भी सही सिद्ध करने के लिए जुटाए गए ऐसे तर्क जो जनता को अत्यंत प्रमाणिक लगें, पुलिस का सच्चा चिट्ठा जैसे खोल कर रख देते हैं.

भावनाप्रधान कहानियों में 'हत्यारा' एवं 'अपराध' जैसी कहानियों को रखा जा सकता है. 'अपराध' कहानी आज के दामिनी के बलात्कार काण्ड की याद दिला जाती है, जिसमें एक निहत्था आदमी एकाधिक गुंडों के सामने कुछ न कर पाने की स्थिति में मन मसोस कर रह जाता है और लड़की को बचा न पाने के लिए खुद को दोषी मानने लगता है. सच है, आप किसी को बचाने के लिए कितने भी ईमानदार हों, कितने भी बलशाली हों, सशस्त्र गुंडों के सामने आप विवश हैं, खामोश रह कर सब सहने के लिए. कहानी 'हत्यारा' में प्रेम की इन्तेहा है. पुलिस की नौकरी आदमी को शुष्क बना देती है, निरंतर ह्त्या, चोरी, डकैती आदि की घटनाओं से गुज़रते हुए संवेदनशीलता चुक ही जाती होगी लेकिन लेखक का ह्रदय संवेदनशील है, तभी वह इस कहानी में ऐसे नायक-पात्र की रचना कर सका जो बिना किसी शर्त के प्रेम करता है और उस प्रेम का निबाह भी करता है.

अन्य कहानियों में 'नाच', 'काण्ड', 'आरा', 'कल्कि अवतार', 'डाइन', 'अंत', 'लाइन ऑफ़ कंट्रोल', 'आरम्भ' हैं. हर कहानी में एक कहानी है, कहानी के ब्यौरे हैं और हालात से निबटने के अलग-अलग रास्ते हैं. 'आरम्भ' एक अलग किस्म की कहानी है जो उम्रदराज़ हो गए एक स्त्री-पुरुष के द्वारा नए जीवन की शुरुआत करने की सम्भावना की ओर संकेत करती है.

पहले भी इस तरह की कहानियाँ लिखी जाती रही हैं लेकिन मुझे नहीं ध्यान कि किसी अन्य लेखक ने इतनी ईमानदारी से इस महकमे की सचाई को उजागर किया हो. पुलिस के अत्याचार, जो पुलिस की नौकरी में एक अनिवार्य एवं सामान्य व्यवहार है, जैसे सचित्र सामने आ खड़े हुए हों और हम खुली आँखों से उन्हें घटता देख रहे हों. पढने के बाद एक इच्छा सी जागी कि भई, यह महकमा तो गज़ब का है, स्याह-सफ़ेद कुछ भी कर लो और कानों-कान किसी को खबर न हो. ऐसी नौकरी जिससे सब डरें, बस दिल मज़बूत होना चाहिए दरिन्दगी के बीच ज़िन्दा रहने के लिए, अन्यथा आदमी ध्रुव गुप्त की तरह मन ही मन बिलखता रहेगा और कहानियों के ज़रिये अपने मन के भारीपन को हल्का करता रहेगा। बुरा नहीं है यह करना।

ध्रुव जी, अब आप कुछ और कहानियाँ लिखिए, बल्कि सिर्फ कहानियाँ ही लिखिए, कहानियों में आप स्वयं को बेहतर तरीके से अभिव्यक्त कर पा रहे हैं. आपकी कहानी ने दिल को हिला कर रख दिया। अब बताइए, कितने ही कानून बन जाएं, कितनी ही फांसी की सजाओं को मान्यता मिल जाए, शहर की लडकियां कितनी ही दबंग क्यों न हो जाएं, इस तबके की लड़कियाँ, बल्कि किसी भी तबके की, ऐसे माहौल में बच ही नहीं सकती। इस स्थिति को बदलने के लिए केवल और केवल पुरुष को अच्छे संस्कार की ज़रुरत है। जब तक पुरुष की सोच में बदलाव नहीं आएगा, तब तक महिलाएं इसी प्रकार ज़ुल्म की शिकार होती रहेंगी। पुरुष की सोच में बदलाव के लिए आवश्यक है कि छोटे शहरों, गाँवों, पिछड़े इलाकों में शिक्षा के प्रसार की ओर सरकार ध्यान दे। / आपने कहानी के मुख्य पात्र का चित्रण बहुत ही सधे हाथों से किया है। उसके मन में लड़की के प्रति आकर्षण स्वाभाविक है। फिर लड़की को असहाय अवस्था में देख कर भी उसका चाहते हुए भी कुछ न कर पाना, उसके मन के भीतर चलने वाला संघर्ष बहुत सहज ढंग से उभर कर आया है। ऐसे हालात में कोई चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता। कुछ न कर पाने की पीड़ा और उस पीड़ा के साथ-साथ उभरा अपराध बोध, जबकि इस सब में उसका कोई कसूर ही नहीं है, फिर भी वह उसे बचाने के लिए खुद को ज़िम्मेदार समझता है और उसे न बचा पाने के लिए स्वयं को अपराधी महसूस करता है, यह एक मानवीय सचाई बड़े प्रभावी तरीके से आपने सामने रखी है। / आपने साधारण संतुलित भाषा में कथा बयान की है। ऐसा लगा जैसे आप उतने ही शब्द लिखना चाहते हैं, जितने से बात बन जाए। लेकिन यह कहानी और विस्तार मांगती है। यदि आपने यहाँ यह छोटी करके सार रूप में प्रस्तुत की है तो ठीक है। अन्यथा इस कहानी में विस्तार की बहुत गुंजाइश है। मसलन लड़के लड़की के आकर्षण को थोडा और खींचा जा सकता था। गाडी में चढ़ने से पूर्व का हिस्सा बढाया जा सकता था। इसी तरह बाद का भी और लड़के के मन-मस्तिष्क में चलने वाली कशमकश। / बहरहाल, कहानी अपने कथ्य को संप्रेषित करने में समर्थ है और यही कहानी की खासियत होती है कि वह जो कहना चाहे, प्रभावशाली ढंग से कह जाए।

No comments:

Post a Comment