Monday, 14 October 2013

रामायण

रामायण

हमारी समस्त पौराणिक गाथाएं हमें आज जीवन को जीने की राह दिखाती हैं. वे तर्कसहित हमारे सामने सही और गलत का भेद प्रस्तुत करती हैं. वेद-पुराणों की उन कथाओं को आज के सन्दर्भ में समझेंगे तो बहुत सारी मुश्किलों के समाधान स्वमेव निकाल पाएंगे। रामायण हो, महाभारत हो, अन्य कोई भी धार्मिक ग्रन्थ हो, इनकी कहानियाँ मनोरंजन मात्र के लिए नहीं हैं. वे हमें शिक्षा देती हैं, एक सही जीवन जीने के लिए. जब तक हम अपने जीवन में तर्क को स्थान नहीं देंगे, हमें जीवन जीने की कला नहीं आएगी। धर्मग्रंथों में प्रकारांतर से यही बताया गया है.

रामायण एकमात्र ऐसा धार्मिक ग्रन्थ है जो धार्मिक ही नहीं, अपितु मनुष्य को सदाचार, सभ्यता, सद्व्यवहार का प्रशिक्षण देता है. इसकी पूरी कथा में कोई प्रसंग, कोई पात्र, कोई घटना ऐसी नहीं जो हमें आदर्श जीवन जीने के लिए प्रेरित न करती हो. इसके नकारात्मक पात्र भी सकारात्मक पात्रों की अच्छाइयों को उभारने के काम में योगदान देते हैं. हम तर्क की कसौटी पर इससे बहुत कुछ सीख सकते हैं.

राजा दशरथ ने कैकेई को वचन दे दिया कि कुछ भी माँग लेना। 'कुछ भी' में 'सब कुछ' शामिल होता है, अब या तो आप मरें या अपना वचन तोड़ें, बेहतर यही है कि इस तरह की प्रतिज्ञा ही न करें।

लंका में रावण सीता को हाथ नहीं लगा सका. यह एक नारी का तेज है, जिसके सम्मुख एक बलशाली पुरुष भी निस्तेज हो जाता है.

रावण बहुत बड़ा ज्ञानी था, लेकिन एक मामले में उसने जो नादानी बरती, तो विनाश को प्राप्त हुआ. उसे अंत तक समझ नहीं आया कि 'ज़िद' बड़े से बड़े ज्ञानी को धूल-धूसरित कर देती है.

रामायण में कुछ अन्य संकेत भी महत्वपूर्ण हैं, जैसे, सीता ने राम से स्वर्ण मृग लाने को कहा. राम ने एक बार भी नहीं सोचा कि क्या मृग भी कभी सोने का होता है? राम द्वारा विवेक से काम न लिए जाने के कारण वह सारा काण्ड हुआ. राम चूँकि सीता से अत्यधिक प्रेम करते थे, इसलिए उन्होंने सीता की माँग के आगे कुछ सोचने-समझने की आवश्यकता नहीं समझी। इसे पूर्ण प्रेममय होने का भाव कहें या कुछ भी कहें, था यह अनुचित। यूँ यह संयोग बना राक्षस-समाज का ध्वंस करने के लिए. इस प्रसंग का सही अर्थ यही है कि जब व्यक्ति, चाहे पुरुष हो या नारी, अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं करता, तो उसके अविवेकी कृत्य से बड़ी से बड़ी तबाही हो सकती है.

रामायण में पुत्र द्वारा पिता की आज्ञा का पालन, सीता का अतुल्य पति-प्रेम, भाइयों के बीच प्रेम भाव अनुकरणीय है.

राम से जुडी कथाओं में राम को एक आम इंसान ही बताया गया है, इसीलिए तो सामाजिक निन्दा का भय उनसे सीता की परीक्षा करवा गया. सही कहा जाए तो रामायण की कथा जनमानस की कथा है. राम आदर्श पुरुष थे, निःसंदेह मर्यादा पुरुषोत्तम थे. राम से जुडी कथाओं में राम को एक आम इंसान ही बताया गया है. अनेक बार उनके द्वारा ली गई सीता की अग्निपरीक्षा की निंदा की जाती है. मेरा तर्क यह है कि राम एक सद्चरित्र व्यक्ति थे, उनके जीवन में किसी अन्य स्त्री के प्रवेश की कोई कथा पढ़ने-सुनने में नहीं आती. वे सीता से असीम प्रेम करते थे. वे पुरुषों में उत्तम थे. एक सद्चरित्र व्यक्ति अपने नाम के साथ कोई कलंक लेकर नहीं जीना चाहता। इसीलिए उन्हें समाज का भी भय था.  एक तो सामाजिक निन्दा का भय उनसे सीता की परीक्षा करवा गया. दूसरे, जिस व्यक्ति के खुद कभी किसी से अनैतिक सम्बन्ध न रहे हों, वह पत्नी भी शुद्ध चाहे तो इसमें क्या बुराई है? दूसरी ओर अन्य देवताओं को देखिए। कृष्ण की सोलह हज़ार रानियां थीं, अनेक गोपियों के साथ रासलीला रचाते थे, राधा के साथ प्रेम सम्बन्ध था. वे क्या किसी की अग्निपरीक्षा लेते? सूर्य देवता ने अविवाहिता कुंती के साथ सम्बन्ध बना कर उसे पुत्र कर्ण सौंपा। इंद्र देवता ने भेष बदल कर ऋषि गौतम की पत्नी अहिल्या के साथ समागम किया। महाभारत के पाण्डु ने नियोग से संतानें उत्पन्न करवाईं। ऐसे देव क्या किसी की अग्निपरीक्षा लेते? एक राम ही निष्कलंक छवि के हैं. सीता की अग्निपरीक्षा में उनका ध्येय सीता पर अविश्वास नहीं, अपितु अपनी निष्कलं छवि को बनाए रखने की कोशिश भर थी. राम मेरे प्रिय पात्र। सदैव पूजनीय।

राम आदर्श पुरुष थे, निःसंदेह मर्यादा पुरुषोत्तम थे. उन्हें भगवान हमने बनाया। ठीक भी है, जिसने राक्षसों का सर्वनाश किया हो, ऋषिओं का जीवन आसान किया हो, जिनकी कथा एक सफल जीवन जीने की राह दिखाती है, वह भगवान नहीं तो और क्या। राम पूजनीय हैं.

हम जो भी धार्मिक प्रसंग उठा लें, उसे आज के सन्दर्भ से जोड़ें तो हम बहुत कुछ सीख सकते हैं. वरना आप गाते रहिये, भज गोविन्दम, भज गोविन्दम, भज गोविन्दम मूढ़मते। मूढ़मते तो वे हैं, जो मात्र नाम का जाप करते हैं, उस नाम के साथ जुडी कहानियों से कुछ सीखते नहीं।

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