Friday, 4 October 2013

अनामिका (कहानी)

अनामिका  (कहानी)

(प्रकाशित : 'बिंदिया' मार्च, 2014)

मैं किसी काम से कनौट प्लेस जा रही थी. अभी मैं घर से निकली ही थी कि एक लड़की ने अँगूठा दिखा कर लिफ्ट माँगी. अमूमन तो मैं किसी को लिफ्ट नहीं देती लेकिन वह लड़की ऐसी जगह खड़ी थी जो न बस स्टॉप था, न ऑटो स्टैंड. उसका मकसद जैसे किसी न किसी से लिफ्ट लेना ही था. मैंने कार रोक दी. उसने बताया, उसे काफी दूर जाना है, पर मैं उसे कनौट प्लेस तक ही छोड़ दूं. मैंने उसे अपने साथ बैठा लिया.

रास्ते में, ज़ाहिर है, कुछ न कुछ बात होनी ही थी. वही अपने बारे में बताती रही, 'अब कौन बसों के धक्के खाए, ऑटो कोई सस्ते हैं क्या? मैं ऐसे ही लिफ्ट लेकर गुज़ारा कर लेती हूँ.'

मैंने मन में सोचा, वाह वाह, कमाल है. चालू, चंट, चतुर, चालाक, ये चार शब्द मेरे मस्तिष्क में स्वतः लहरा गए.

फिर उसने बताया कि उसने एक बार आधी रात को किसी से लिफ्ट ली थी. गाड़ी में दो लड़के थे, आगे बैठे हुए थे, वह पीछे बैठी थी. मैंने पूछा, तुम्हें डर नहीं लगा तो वह बोली, 'डरना कैसा? डर तो उन लड़कों को मुझसे लगना चाहिए था. मुझे पीछे बैठाते हुए उन्होंने नहीं सोचा कि कहीं मैं उन्हें पीछे से चाक़ू-गोली ना मार दूँ?'

तुम धन्य हो, मैंने कहा नहीं, सिर्फ सोचा। निकला मेरे मुँह से यह, 'फिर भी .... अखबारों में नहीं पढ़तीं, कितने हादसे रोज़ होते हैं? तुम इतनी छोटी, सुन्दर सी लड़की, कहीं किन्हीं वहशियों के हाथ पड़ गईं तो?'

उसने तुरंत उत्तर दिया, 'अरे मैडम, ज्यादा से ज्यादा वो क्या कर लेंगे? अपन का उसूल है, कहीं फँस जाओ और ज़िन्दगी व मौत के बीच बाज़ी लगी हो तो ज्यादा हो-हल्ला नहीं करने का, आराम से एंज्वाय करने का.'

माई गुडनेस ! मैं उसकी बात सुन कर धक्क रह गई. बड़ा बिन्दास तरीका है जीने का. बोल ऐसे रही है, जैसे अभी कोई बम्बइया फिल्म देख कर आई है. या कहीं यह लड़की मुंबई से ही तो नहीं है? बात करने का लहज़ा मुम्बइया है. छोडो, मुझे क्या? पर यदि यही इन्तेहा है तो भई डटे रहो. लेकिन कहा मैंने उससे यह, 'कोई दूसरा तुम्हारे साथ कुछ क्यों करे? तुम करो जो करो. च्वाएस तुम्हारी हो, दूसरे की नहीं.'

उसने एक क्षण मेरी ओर देखा, जैसे आँखों ही आँखों में मेरी बात की सचाई को तोल रही हो. फिर बोली, 'आपने बड़ी ग्रेट बात कही मैडम,' कह कर वह हँस दी.

मैंने उसके बारे में जानने की नीयत से कहा, 'अनमैरिड लगती हो. वैसे आजकल पता नहीं चलता, कौन शादीशुदा है, कौन क्वारा?'

'शादी जल्द ही करने वाली हूँ. लड़का मेरी च्वाएस का है. वेरी वेल-टु-डू. शादी के बाद मुझे लिफ्ट लेने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी.'

'क्यों? क्या हर वक्त वह तुम्हें छोड़ा करेगा?' मैंने कहा, यद्यपि मुझे यह नहीं पता था कि रोज़ उसे कहीं जाना भी होता है या नहीं?

'नहीं जी, शादी के बाद मेरे पास मेरी अपनी कार होगी. उसने वादा किया है.' अभिमान का तेज उसकी आँखों में दिखाई दिया.

'तो तुम उस पर आश्रित रहोगी?' मेरी बात उसे तीर की तरह चुभी. वह जैसे बिलबिला उठी.

'मैडम, शादी एक गिव एंड टेक है. क्या वह कार मुझे मुफ्त में देगा? क्या उसे मुझसे कुछ नहीं मिलेगा?' 

उसकी बात मुझे आश्चर्यचकित करने वाली थी. उसका गणित पक्का था. मैंने कभी इस लेन-देन की मानसिकता की ओर ध्यान नहीं दिया था. मैं बोली, 'पर जो उसे तुमसे मिलेगा, वह तुम्हें भी तो उससे मिलेगा? क्या तुम्हारे लिए उस प्यार का, उस सुख का कोई महत्त्व नहीं?'

कनौट प्लेस आ गया था. मैंने जनपथ पर अपनी गाड़ी पार्क की. हम दोनों कार से उतरे. मुझे उसकी बातें दिलचस्प लग रही थीं. शायद उसे भी. मैंने कहा, 'तुम्हारे पास टाइम है तो कॉफ़ी पिएँ?'

उसके 'हाँ' कहने पर हम दोनों मैकडोनल्ड में घुस गए. अब हम एक छोटी सी मेज़ को घेर कर आमने सामने बैठे थे.

मैंने पहली बार उसे गौर से देखा, तीखे नैन-नक्श की, गौरवर्णी, जिसे निःशंक सुन्दर कहा जा सकता था, उम्र होगी, बीस-पच्चीस के आसपास, फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाली, ग्रेजुएट तो होगी ही, पहनावा आधुनिक यानि टाँगों से चिपकी हुई जीन्स के ऊपर एकदम टाइट टॉप, शरीर के सारे उभार और कटाव सलीके से नज़र आ रहे थे. आँखों में अपने खूबसूरत होने का अहसास था. चेहरे पर स्वाभिमान का रुआब था.

कॉफ़ी न लेकर हम ने फाउन्टेन पेप्सी लिया और स्ट्रॉ को होठों में दबा कर बात शुरू करने का इंतज़ार करने लगीं. बात मैंने ही शुरू की, 'तो? तुम्हारी नज़रों में शादी एक गिव एंड टेक है?'

'और नहीं तो क्या? मैडम, आपके ज़माने में औरतें गिव ही गिव करती थीं, हम नई पीढ़ी ने टेक के बारे में भी सोचा. आखिर कब तक पिसते रहें हम इन मर्दों की ज्यादतियों तले?' उसकी आवाज़ आक्रोश से थरथरा रही थी. 'मर्द' शब्द जैसे एक गाली को प्रतिध्वनित कर रहा था.

'किस ने ज्यादती की तुम्हारे साथ?' मेरे पूछने मात्र से वह भड़क उठी, 'मैडम, आप इतना भी नहीं समझतीं कि मैं एक आम औरत की बात कह रही हूँ, व्यक्तिगत नहीं? कितना सहा है, हम औरतों ने? बस, अब और नहीं.'

'ऐसी बात नहीं है, मैं भी औरत की आज़ादी के पक्ष में हूँ. इतनी भी पुरानी नहीं हूँ जितनी तुम सोच रही हो. मेरी पूरी कोशिश रहती है, नए ज़माने के साथ कदम से कदम मिला कर चलने की,' कहते हुए मेरे चहरे पर ज़रूर बेचारगी का भाव रहा होगा, क्योंकि मैं इस मलाल में थी कि काश ! मेरी उम्र इस लड़की की उम्र के बराबर होती तो आज मैं भी खुद को नई पीढ़ी की कह कर गर्वोन्नत होती. मेरे भीतर एक अजीब सी मायूसी उभर आई और कुछ पलों के लिए मैं अपने अन्दर के किसी अँधेरे तहखाने में गुम हो गई.

'मैडम, आप नहीं सोचतीं कि अब तक औरत के साथ अन्याय होता आया है?' उसकी आवाज़ से जैसे मेरी तन्द्रा टूटी. मैंने एकबारगी यह भी सोचा, वह किसी महिला संस्था या महिलाओं के पक्ष में काम कर रही किसी एन जी ओ से तो सम्बद्ध नहीं है? कहीं वह ऐसे ही किसी प्रचार के लिए तो मुझे माध्यम नहीं बना रही? मुझे सैकड़ों औरतों की सिसकियाँ सुनाई देने लगीं, जिनके साथ हुए अन्याय-अत्याचार की कहानी मैं सुन चुकी थी. कई स्त्रियों को पुरुष से यह प्रशंसा सुननी तो नसीब हुई थी कि उन्होंने पुरुष का जीवन निखारने-सँवारने में योगदान दिया, लेकिन उनका अपना जीवन ना निखरा था, ना सँवरा था. अमीर घरों की स्त्रियाँ पैसे के बल पर सुखी नज़र आती थीं, लेकिन प्यार के बल पर वहाँ भी शून्य था. उनके पास कपड़ों-गहनों के ढेर थे लेकिन जीवन में कोई निर्णय लेने का अधिकार नहीं था.

मैं सोच में डूबी हुई थी कि उसकी आवाज़ ने मुझे फिर से झकझोर दिया, 'मैडम, हमें चुप नहीं बैठना है. हमें अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी. इन कमीनों को सबक सिखाना होगा.'

मैंने हकलाते हुए कहा, 'हाँ आँ ..... तुम सही कह रही हो. पर किन कमीनों को?'

'नासमझी की हद कर दी आपने, अरे इन पुरुषों को ..... '

ओह, कैसे बोल रही है? इसे मेरी उम्र का कोई लिहाज नहीं? बच्ची, मैं तुझसे बड़ी हूँ कितनी, कुछ तो इज़्ज़त कर. लेकिन मैंने अपनी कोई नापसंदगी ज़ाहिर नहीं की. ज़ाहिर किया तो यह, 'ओह ! छोडो, गाली मत दो .....'

'यह भी कोई गाली हुई, मैडम? गालियाँ तो मेरी सहेलियाँ देती हैं, एकदम शुद्ध लड़कों वाली। मैं तो 'कुत्ता', 'कमीना' से आगे नहीं बढ़ पाती.'

शुक्र है, मैंने मन में सोचा, बोला यह, 'मेरे दिमाग में आज़ाद औरत की एक तस्वीर है, एक कल्पना है, एकदम फूलप्रूफ ..... '

'बताइए ना प्लीज़, जल्दी ..... ' 'जल्दी' उसने ऐसे कहा जैसे वह अभी उस पर अमल कर लेगी.

'देखो, आज़ाद होना है तो पहले आर्थिक स्वतन्त्रता होनी चाहिए ..... '

'यह बात बहुत पुरानी हो गई. सबको पता है. कोई नई बात बताएँ.'

'तुम पति से कार लेने की बात कर रही थीं ना? उसकी दी हुई चीज़ों पर ऐश करने की बजाय तुम इस काबिल बनो कि उसे कार दो ..... '

'व्हाट अ नॉनसेंस ! सौरी मैडम ..... पर बात कुछ जमी नहीं.'

'जमेगी, पूरी सुनो। खर्च का बराबर बटवारा करो ..... '

'आप तो ग़ज़ब हैं, मैडम। बड़ी विचित्र बात कह रही हैं आप. हम उसके बच्चे भी पैदा करें और पैसा भी खर्च करें?'

मुझे लगा, बड़ा कठिन है, इस कदर हिसाबी-किताबी लड़की से स्वस्थ संवाद बनाए रखना. फिर भी, जवाब तो देना था. इसलिए मैंने कहा, 'बच्चे तुम्हारे भी तो कहलाएँगे. तुम माँ होने के नाते बच्चों से ज्यादा प्यार करोगी, भावात्मक रूप से उन पर ज्यादा निर्भर रहोगी.'

'बस मैडम बस, वह हमारे शरीर का इस्तेमाल करेगा तो हम पर खर्च भी नहीं करेगा?' वह खीज कर बोली. मुझे किसी के द्वारा कही गई या कहीं पढ़ी हुई यह सूक्ति स्मरण हो आई कि वाइफ़ इज़ अ लीगल प्रोस्टिच्यूट. उफ़ ! मुझे स्वयं से घिन होने लगी, मैंने ऐसा क्यों सोचा. कहने को कहा मैंने
यह, 'तुम भी तो उसके शरीर का इस्तेमाल करोगी? क्या शारीरिक सुख सिर्फ वह भोगेगा, तुम नहीं? और इस सुख को केवल शरीर तक सीमित मत करो. प्रेम से उसके मन के भीतर उतरना होगा और उसे अपने मन में बैठाना होगा.'

'ओह हो ! और फिर एक दिन उसका दिमाग खराब हो गया तो वह हमें घर से निकाल कर बाहर खड़ा करेगा?'

उसकी यह बात सुन कर मुझे उस पर तरस आया. इसने ज़रूर कुछ ऐसी दुर्घटनाएँ करीब से देखी हैं, जिनके काले साए इसके दिलो-दिमाग पर छाए हुए हैं. यह लड़की ज़रूर चोट खाए हुए है. मैंने उसके हाथ पर अपना हाथ रख दिया, मानो किसी नामालूम दुःख के लिए उसे सान्त्व्ना दे रही होऊँ. इस स्पर्श ने जादू का सा असर किया. उसकी आँखों में पानी-सा नज़र आया, जो मेरे कुछ सोचने से पहले धार-धार उसके गालों पर बहने लगा. मैंने आँसू पोंछने के लिए उसे टिशू पेपर दिया, अपनी कुर्सी से उठ कर उसके पास आई, उसके कन्धों को थपथपाया और बोली, 'रोते नहीं, यू आर अ ब्रेव गर्ल.'

उसने भर्राए गले से कहा, 'वह साला कमीना था.'

'कौन?' मैंने पूछा. सोचा, शायद किसी लड़के से धोखा खाए हुए है. नवयुवा है, सुन्दर है, पीछे लगने वाले लड़कों की क्या कमी होगी? हर लड़का वफादार नहीं होता. सच है, लड़का कोई कुत्ता नहीं होता जो वफादार हो. छिः छिः, मुझे अपने आप पर शर्म आई, मैं क्यों उसके शब्दों में सोच रही हूँ?

'मेरा बाप, साला कुत्ता,' उसके मुंह में इतनी कडवाहट थी, मानो, बाप के नाम पर वह वहीँ थूक देगी. तो इसलिए लड़कों और ज़िन्दगी के प्रति उसका इतना चलताऊ रवैया है? शायद यही कारण है कि उसने जैसे अपने को फ़ेंक दिया है, बहती लहरों के बीच, जो उसे पार तो लगाने से रहीं, उसके डूबने की ही अधिक संभावना है. यूँ मझधार में छलाँग लगा देना उसका साहस नहीं, कमजोरी है. पहले अच्छी तरह तैरना तो सीख ले, पगली. शायद वह एक आत्महन्ता मनस्थिति से गुज़र रही है, मैं सोचे जा रही थी, लेकिन उसके मन में उलझी गुत्थियों को सुलझाने का सिरा नहीं ढूँढ पा रही थी.

जल्दी ही उसने खुद को सँभाल लिया और आगे कहा, 'वैसे मैडम, मैं शादी करने से डरती हूँ. कहीं वह भी मेरे बाप जैसा कमीना निकला तो ..... '

मैंने अपनी कुर्सी उसकी कुर्सी के पास खिसका ली और उसका कंधा थपथपाते हुए बोली, 'इसका भी इलाज है ..... '

'क्या?' उसने पूछा तो मैं एकबारगी रिश्तों के खोखलेपन की बात सोच कर भीतर ही भीतर सम्वेदना शून्य हो गई. क्या ऐसा संभव है कि हम अपनी शर्तों पर ज़िन्दगी जी पाएँ? हाँ, संभव तो है, लेकिन उसके लिए आवश्यक है, आपकी खुद की कमाई हई एक बेहद सुविधाजनक जीवन शैली और ज़माने भर की लानतों के बीच से गुज़रने का साहस. कठिन कुछ भी नहीं है, बस, एक बार आप ठान लें.

मैंने उसे उपचार सुझाने के अनुमान से कहा, 'उसके घर में रहने की बजाय उसे अपने घर में रखो ताकि कभी रिश्ते बिगड़ने की नौबत आए तो घर से वह निकले, तुम नहीं ....., ' कहते हुए मुझे लगा, कहीं मैं मज़ाक में तो बात को उड़ाने की कोशिश नहीं कर रही? मैंने पहले तो कभी इस तरह से नहीं सोचा, फिर आज कहाँ से यह विचार उत्पन्न हो गया? हो सकता है, मेरे अवचेतन मन में यह फितूर चल रहा हो कि औरत को आज़ाद होना है तो सबसे पहले उसे मर्द की दी हुई सुविधाओं से अपने को मुक्त करना होगा, उसे इस काबिल बनना होगा कि वह ठीक उसी अंदाज़ में अपने मनचाहे पुरुष को एक घर का सुख देकर अपने पास रख सके, जैसे पुरुष उसे आजतक रखता आया है. पुरुष सत्तात्मक समाज को बदलना है तो इस तरह आगे बढ़ो, अन्यथा प्रेम में तो पुरुष स्त्री, दोनों एक दूसरे के तलवे चाटते हैं, इस सत्य से कौन परिचित नहीं है?

वह चुप, कुछ सोचती सी बैठी रही. जैसे वह भी मेरी तरह आत्म-मंथन में फँसी हो. मैंने आगे कहा, 'ज़िन्दगी की शुरुआत नकारात्मक सोच से नहीं होती. अभी शादी का विचार दिल से निकाल दो, अभी पढ़ो-लिखो, कुछ बनो, कुछ साल बाद शादी करने की सोचना ..... '

'आपका कहना ठीक है, आंटी, अभी मेरी उम्र ही कितनी है? सिर्फ बाइस वर्ष ही तो है, पहले कुछ बन जाऊँ.'

उसने पहली बार मुझे 'आंटी' कहा था, मैं खुश हुई. मुझे लगा, मेरी बात उसके भीतर कहीं तो उतरी है. एक अनजाना सा अपनापन मुझे उसकी ओर खींचने लगा. मैंने उसे गले से लगा लिया.

हम उठ खड़े हुए. 'थक गई ना? भूख लगी होगी?' मैंने कहा और मैकडोनल्ड से बाहर निकलने से पहले बर्गर खरीदे. बर्गर का पैकेट उसे पकड़ाते हुए कहा, 'रास्ते में खा लेना.'

मैं अपनी कार की ओर बढ़ी, वह दूसरी दिशा में. मैंने उस पर एक नज़र डाली, मेरी ओर उसकी पीठ थी. छरहरी देहाकृति पर ब्वाय कट, लम्बे बालों में वह ज्यादा सुन्दर लगती. सुन्दर तो वह थी ही पर और ज्यादा सुन्दर लगती. मैंने सोचा. तभी मुझे ख्याल आया, अरे, उसका नाम .... ? लेकिन वह दूर जा चुकी थी. पूछना नामुमकिन था. मैंने उसके लिए दुआओं में हाथ ऊपर उठा दिए, प्रभु, उसकी रक्षा करना.

19 comments:

  1. स्त्रियों को पुरुषों की निर्भरता से मुक्त करती, और उन्हें आत्म निर्भरता की दिशा की ओर जाने को प्रेरित करती एक विचार प्रधान कहानी ।

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    1. ओम गिल जी, आपकी टिप्पणी मेरे लिए बहुमूल्य है.

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  2. kahani acchi lagi...par kya ye hamare samajh ke sabhi pursho k liy sahi hai...mujhe nahi lagta...

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    1. प्रिंस सिंह, कहानी पसंद करने के लिए धन्यवाद। आप अपनी बात स्पष्ट करते तो बेहतर होता।

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  3. ह्म्म्म ....एक घटना मेरे दीमाग में अभी उभरी .....सत्य घटना .....आपकी कहानी बढ़िया है ....और एक दिशा की और इंगित करती भी ...:)

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    1. Raghvendra ji, कहानी पसंद करने के लिए धन्यवाद।

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  4. दिमाग को झकझोड़ गयी यह कहानी ………… कितना दर्द , कितना गुस्सा , कितनी घृणा भरी है एक कन्या / स्त्री के मन में ……… और अपने आपको दिलासा देती बहादुरी का खोल पहन कब तक डरती रहेगी अपने असुरक्षित भविष्य के लिए …………अभी और कितना ज्वलंत रहेगा यह प्रसंग , पता नहीं ………
    Excellent Story or its better to say A Real Scenario .

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    1. नीता, आपने मेरी कहानी को कितना सही समझ का टिप्पणी की है ..... और अपने आपको दिलासा देती बहादुरी का खोल पहन कब तक डरती रहेगी अपने असुरक्षित भविष्य के लिए … आपका बहुत आभार।

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  5. अपने समाज में हो रही घटनाओं को सोचते हुए आपने जो भी लिखा बहुत सही से लिखा है ....आपने एक लड़की के दिल को समझा ये भी बहुत बडी बात है .....

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    1. आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ.

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  6. आज की युवा पीढ़ी की सोच को समझ पाना सच में बहुत मुश्किल है ...हम इस पीढ़ी को शिक्षा तो दे सकते है पर उसे मानने के लिए ज़बरदस्ती नहीं कर सकते

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    1. सच कहा आपने, अनु जी.

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  7. मणिकाजी इसका एक दुखद पहलू भी है । समाज मे अब एक ऐसा वर्ग भी तेजी से बन रहा है जो आत्मनिर्भर औरतों की कमाई पर मौज कर रहे हैं । औरते तो बच्चा पैदा करती थीं।उन्हे पालती थीं ।कपड़े सिलाई करती थीं खाना बनती थी और जरूरत भर बाहर निकलती थीं। ये चाहते हैं की औरतें कमाएं भी और घर का सारा काम भी करें। ऐसे पति को छोड़ दें तो फिर घर बाहर की सारी सारी जिम्मेवारी अकेले उठाएँ। पत्नियाँ जिस तरह से काम से लौटने वाली पतियों की सेवा करती हैं ये वैसा कभी नहीं कर सकते।

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    1. कलावंती जी, आपकी चिन्ता सही है, लेकिन स्त्री हो या पुरुष, बिना किसी दवाब के बेहतर स्थिति में रहेंगे।

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  8. aadarneey manikaji, aapki kahani ne ek nayi soch ko janm diya hai...sateek lekhan,..,skaratmak soch...,aur aapki kalam ki nirantarta....nisandeh:bahut prabhavit kiya aapki ''anamika '' ne.

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    1. अर्चना जी, कहानी पसंद करने के लिए आपकी आभारी हूँ. सदभाव बनाए रखें।

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  9. Too gud Manika G...
    Thanks for sharing

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  10. कहानी की शुरूआत में जितनी अच्छी और प्रभावशाली है अन्त में उपदेशात्मक सी हो गयी है इसलिए अंत अच्छा नहीं लगा

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  11. कहानी की शुरूआत में जितनी अच्छी और प्रभावशाली है अन्त में उपदेशात्मक सी हो गयी है इसलिए अंत अच्छा नहीं लगा

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