Tuesday, 1 October 2013

जागृतावस्था Kavita 175

जागृतावस्था

लोग कहते हैं
मेरे चेहरे पर खूँखारियत रहती है
मेरे व्यवहार में है खुरदुरापन
मेरे सजने में है अनगढ़ता
मेरे बोलने में लापरवाही है
मेरे व्यक्तित्व में नहीं कोई आकर्षण
फिर भी तुमने मुझसे किया प्रेम का प्रदर्शन
तुम्हें डर नहीं लगा?

तुमने बताया, तुम डरते क्यों?
मैं जो भी थी, जैसी भी थी
'ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया' जैसी
अस्पर्शित, अनगाई गीत जैसी
मन और आत्मा में कुलबुलाहट को संजोये हुए
एक-एक कण में अनेक सपने बोये हुए
मेरे बेढंगेपन में एक अलग ढंग था
मेरे बदरंग जीवन का एक अलग रंग था.

लोग कहते हैं
मेरे माथे पर खड़ी रेखाएं हैं
मेरी आँखों में मुरझायापन है
मेरे होठों पर सहमी मुस्कान है
मेरी चाल में नहीं कोई सलीका
मेरे हाल लगते हैं बदहाल
फिर भी तुमने मुझसे नहीं किया कोई सवाल
तुम्हें डर नहीं लगा?



तुमने कहा, तुम डरते क्यों?
मेरी अनगढ़ता ने गढ़ा है तुम्हें
मेरी निरर्थकता में से खोजे तुमने अर्थ
मुझसे अर्थ पा तुम सार्थक हुए
तुमने अँधेरे में बनाए चित्र
मेरे सानिध्य में हुए तुम पवित्र.
मेरा अनछुआ चेतन-अवचेतन भी
तुमने छू कर जागृत कर दिया.


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