Friday, 18 October 2013

दुःख लिख दो Kavita 177

दुःख लिख दो

मैं तुम पर कोई कहानी नहीं लिखूँगी
लिखूँगी तो स्मृतियाँ भटकेंगी
स्मृतियाँ भटकेंगी तो आँखें बरसेंगी
आँखें बरसेंगी तो मन बौरा जाएगा
मन बौरा जाएगा तो फिर कैसे लिखूँगी?

मैं तुम्हें भूल रही हूँ
भूल रही हूँ तो भूल जाती हूँ कि मुझे क्या भूलना है
क्या कुछ भूलते-भूलते मुझे क्या कुछ याद आ जाता है
याद आ जाता है तो मैं भूल नहीं पाती
भूल नहीं पाती वह सब, वह सब जो मुझे भूलना है.

तुम हर मामले में कितने बेफिक्र थे
बेफिक्र थे इसीलिए तुमसे दुःख लिखे गए
दुःख लिखे गए, या कागज़ कोरे छूटे
कोरे छूटे या तुम दुःख लिखने ही आए थे?
तुम दुःख लिखने आए थे, लिख कर चले गए.

अधलिखे कागज़ उलट-पुलट रही हूँ
लिखने को लिखा तो सिर्फ दुःख
पढने को पढूं तो सिर्फ दुःख
कहने को कहूँ तो सिर्फ तुमसे
सुनने को सुनूँ तो सिर्फ तुम्हें।

खाली पन्नों जैसा खाली मन
खाली है इसलिए दोबारा लिखा जा सकता है
दोबारा लिखोगे तो भी तुम ही लिखोगे
लिखो, फिर से दुःख लिख दो
तुम्हारे दुःख से इतर कोई सुख नहीं।

तुम मुक्त उड़ रहे हो मेरे आकाश में
मेरे आकाश में मैं उड़ नहीं सकती
उड़ नहीं सकती क्योंकि मैं कैद हूँ
मैं कैद हूँ तुम्हारे होने, न होने के बीच
बीच में होना, न होने जैसा ही।

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