Friday, 29 November 2013

अंतर्द्वन्द Kavita 180

अंतर्द्वन्द

मैं कहाँ हूँ?
मैं दोनों तरफ हूँ
पुरातन में भी, अधुनातन में भी
भारतीय में भी, पाश्चात्य में भी
प्राचीन में भी, नवीन में भी.
मैं परम्परा और आधुनिकता का
सही मिश्रण हूँ.
मैं नए युग की हूँ,
मैं समकालीन हूँ
अपनी जड़ों से जुड़ी हुई समकालीन।

क्या मैं सही हूँ?
या मैं कहीं की नहीं हूँ?
मैं पूरी पुरानी भी नहीं बचीं
मैं पूरी नई भी नहीं बनीं
मुझे पुरातनपंथी पसंद नहीं करते
क्योंकि मैं आधुनिक हूँ
मुझे आधुनिक पसंद नहीं करते
क्योंकि मैं परम्परावादी नज़र आती हूँ
मैं कहीं की नहीं हूँ
मैं अधर में लटकी हुई हूँ.

शायद अधर में लटके हुए लोग बेहतर होते हैं
हर घेरे में ठीक से समा जाते हैं
हर जगह अपनाए जाते हैं
चुस्त और दुरुस्त।
मुझे दोनों तरफ रहना है.

नहीं, अधर में लटके लोग समझौतापरस्त होते हैं
सुधर जाओ
या तो इधर हो जाओ या उधर हो जाओ
वरना हवा में उड़ती रहोगी
फटे कागज़ के टुकड़ों की तरह.

Sunday, 10 November 2013

एक अजीब प्रार्थना Kavita 179

एक अजीब प्रार्थना

भगवन, तूने की हैं ये सब गड़बड़ें।
जिसमें लबालब भरने की सामर्थ्य थी
उसे खाली रहने दिया,
जो दौड़-भाग में चतुर था
उसे बैसाखियाँ थमा दीं,
जो अपने धर्म में लगा था
उसकी राह में प्रेम रख दिया,
जो कर्तव्य निभा रहा था
उसके आगे ऐश्वर्य के ख़ज़ाने खोल दिए.
यह तूने क्या किया, भगवन, यह तूने क्या किया?

दिशा-भ्रम में घूम रहे हैं सब
भीतर-बाहर उलट-पलट हो रहा है,
शंका-आशंका के बीच
मृगतृष्णा दौड़ा रही है,
स्वर्ण-रजत सी उम्मीदें
मारक बन जाती हैं,
निर्णय की घड़ी में 
साँस बची रहने का भरोसा नहीं।
यह क्या हो रहा है?
सच में नहीं पता, भगवन, यह क्या हो रहा है?

आएगा चल कर कौन सी दिशा से
भावी का अनजाना प्रेत?
दूर-दूर क्षितिज तक
अँधेरा ही अँधेरा है.
कौन सी बाधाएँ मिट पाएँगी?
कौन सी दुआएँ फलेंगी, कब?
रास्ते के कंकड़-पत्थर
बुहारने के लिए आएगा कौन?
तूने ही सारी गन्दगी फैलाई है
तू ही अब आ, भगवन, और समेट इसे.

Tuesday, 5 November 2013

अब ना खिलूँगी मैं Kavita 178

अब ना खिलूँगी मैं

खो दिया, सच में उसने मुझे खो दिया
कि ढूँढने से भी अब ना मिलूँगी मैं
शाख से टूट कर गिरा हुआ फूल हूँ
कि अब ना कभी भी, अब ना खिलूँगी मैं.
उसका कहीं कोई अस्तित्व नहीं था
बिना रोशनी के भी रोशनी थी तब
जलाने की कोशिश में एक नया दीप
बुझा गया पहले से जले चिराग सब.

कि सपनों में मिलना, सपनों में जीना
शब्दों का खेल था, खेल में थी प्रीत
कि शब्द सब टूट गए, खेल सब छूट गए
भावनाएँ मृत हुईं, मौन हुए गीत.

आँखों के द्वार बंद कर देखती थी 
मन के आँगन में खिलती हुई कलियाँ
खुली आँखों से देखा मुरझ गए फूल
रौनकें ख़त्म हैं, सूनी पड़ी गलियाँ

सतरंगी फूलों में सुगंध नहीं है
बुझी हुई आस के किनारे नहीं हैं
कि लहरों के साथ बहने में था रास
कि अब वही धार के सहारे नहीं हैं.