Tuesday, 5 November 2013

अब ना खिलूँगी मैं Kavita 178

अब ना खिलूँगी मैं

खो दिया, सच में उसने मुझे खो दिया
कि ढूँढने से भी अब ना मिलूँगी मैं
शाख से टूट कर गिरा हुआ फूल हूँ
कि अब ना कभी भी, अब ना खिलूँगी मैं.
उसका कहीं कोई अस्तित्व नहीं था
बिना रोशनी के भी रोशनी थी तब
जलाने की कोशिश में एक नया दीप
बुझा गया पहले से जले चिराग सब.

कि सपनों में मिलना, सपनों में जीना
शब्दों का खेल था, खेल में थी प्रीत
कि शब्द सब टूट गए, खेल सब छूट गए
भावनाएँ मृत हुईं, मौन हुए गीत.

आँखों के द्वार बंद कर देखती थी 
मन के आँगन में खिलती हुई कलियाँ
खुली आँखों से देखा मुरझ गए फूल
रौनकें ख़त्म हैं, सूनी पड़ी गलियाँ

सतरंगी फूलों में सुगंध नहीं है
बुझी हुई आस के किनारे नहीं हैं
कि लहरों के साथ बहने में था रास
कि अब वही धार के सहारे नहीं हैं.

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