Sunday, 10 November 2013

एक अजीब प्रार्थना Kavita 179

एक अजीब प्रार्थना

भगवन, तूने की हैं ये सब गड़बड़ें।
जिसमें लबालब भरने की सामर्थ्य थी
उसे खाली रहने दिया,
जो दौड़-भाग में चतुर था
उसे बैसाखियाँ थमा दीं,
जो अपने धर्म में लगा था
उसकी राह में प्रेम रख दिया,
जो कर्तव्य निभा रहा था
उसके आगे ऐश्वर्य के ख़ज़ाने खोल दिए.
यह तूने क्या किया, भगवन, यह तूने क्या किया?

दिशा-भ्रम में घूम रहे हैं सब
भीतर-बाहर उलट-पलट हो रहा है,
शंका-आशंका के बीच
मृगतृष्णा दौड़ा रही है,
स्वर्ण-रजत सी उम्मीदें
मारक बन जाती हैं,
निर्णय की घड़ी में 
साँस बची रहने का भरोसा नहीं।
यह क्या हो रहा है?
सच में नहीं पता, भगवन, यह क्या हो रहा है?

आएगा चल कर कौन सी दिशा से
भावी का अनजाना प्रेत?
दूर-दूर क्षितिज तक
अँधेरा ही अँधेरा है.
कौन सी बाधाएँ मिट पाएँगी?
कौन सी दुआएँ फलेंगी, कब?
रास्ते के कंकड़-पत्थर
बुहारने के लिए आएगा कौन?
तूने ही सारी गन्दगी फैलाई है
तू ही अब आ, भगवन, और समेट इसे.

No comments:

Post a Comment